भारत पर अदृश्य वार: CIA–मोसाद की गहरी जड़ें और सत्ता के खेल का खुलासा

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तहलका टुडे डेस्क

भारत आज महज़ अपनी आंतरिक राजनीति से नहीं, बल्कि बाहरी खुफिया नेटवर्क की गुप्त चालों से भी जूझ रहा है। घटनाओं की सतह पर जो दिखाई देता है, वह असल कहानी का केवल एक हिस्सा है—असल खेल परदे के पीछे से खेला जा रहा है, जहाँ CIA और मोसाद जैसे एजेंसियाँ अपने एजेंटों और थिंक टैंकों के जरिए सत्ता के समीकरण बदलने की कोशिश में लगी हैं।


चरण-1: सोशल मीडिया से मानसिक युद्ध

पहले चुनाव में विदेशी दखल का सबसे बड़ा हथियार बना सोशल मीडिया। टारगेटेड ट्रेंड्स, फेक न्यूज फैक्ट्री और एल्गोरिद्म मैनिपुलेशन—इनके जरिए मतदाताओं की सोच पर असर डाला गया। यही फार्मूला अरब स्प्रिंग में अपनाया गया था, जब कई देशों में सत्ता का नक्शा रातों-रात बदल गया।


चरण-2: वक्फ एक्ट पर साम्प्रदायिक बारूद

देश में मौजूद सत्ता और सरकार में बैठे विदेशी एजेंटों ने वक्फ एक्ट को लेकर बवाल खड़ा किया।

असली मकसद था मुस्लिम समाज को भड़काना और सरकार के खिलाफ खड़ा करना। यह विवाद केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि धार्मिक संवेदनाओं से खेलकर एक समुदाय को राजनीतिक मोहरे में बदलने की कोशिश थी।जो अभी तक कामयाब नहीं हुई।


चरण-3: पहलगाम हमला, पाकिस्तान तनाव और टैरिफ का वार

पहलगाम में हमले और पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव के तुरंत बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने ट्रेड टैरिफ का हथियार चला दिया। भारत को आर्थिक मोर्चे पर दबाव में लाने का यह वही तरीका है, जो वे ईरान और रूस के खिलाफ इस्तेमाल कर चुके हैं।


चरण-4: बिपिन रावत की हेलिकॉप्टर दुर्घटना – हादसा या साजिश?

भारत के पहले CDS जनरल बिपिन रावत की अचानक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत—यह महज़ तकनीकी त्रुटि थी या एक सुनियोजित ऑपरेशन? सैन्य हलकों और इंटरनेशनल इंटेलिजेंस कम्युनिटी में इस पर अभी भी सवाल उठते हैं, लेकिन सरकारी चुप्पी कई शक पैदा करती है।


चरण-5: विपक्षी मोर्चाबंदी – स्क्रिप्टेड गिरफ्तारी और रोड शो

अखिलेश यादव का बैरिकेडिंग पार करना, राहुल और प्रियंका गांधी की गिरफ्तारी—ये घटनाएँ जनता को ‘जमीनी आंदोलन’ का आभास देती हैं, लेकिन राजनीतिक जानकार इन्हें पॉलिटिकल स्क्रिप्ट का हिस्सा मानते हैं, जिसमें विदेशी रणनीतिकार भी परोक्ष रूप से शामिल हो सकते हैं।


चरण-6: फतेहपुर का मकबरा विवाद – धार्मिक पहचान पर हमला

फतेहपुर में एक पुराने मकबरे, जिसमें असल में कब्र थी, को ‘मंदिर’ बताकर उस पर हमला किया गया। यह वही डिवाइड एंड रूल पॉलिसी है जो औपनिवेशिक काल में लागू हुई थी—धार्मिक स्थल को हथियार बनाकर जनता को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना।


CIA–मोसाद नेटवर्क और मोदी–योगी पर प्रेशर

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इज़राइल के बेंजामिन नेतनयाहू के दौर में CIA और मोसाद की भारत में मौजूदगी और गहरी हो गई। अब लक्ष्य है मोदी और योगी सरकार को एक साथ घेरना, अस्थिर करना और नीतिगत फैसलों को अपने पक्ष में मोड़ना


RSS और मीडिया की चुप्पी – समझौते का संकेत?

वो RSS और गोदी मीडिया, जो पहले हर मुद्दे पर सबसे ऊँची आवाज़ में बोलते थे, अब इन साजिशों पर खामोश हैं। क्या यह चुप्पी महज़ रणनीतिक है, या फिर विदेशी दबाव और अंदरूनी डील का नतीजा?


 भारत का लोकतंत्र चौराहे पर

आज भारत के सामने चुनौती केवल विपक्ष या आर्थिक संकट की नहीं, बल्कि बाहरी ताकतों और अंदरूनी दलालों के गठजोड़ की है। सवाल यह है कि क्या भारत अपने राजनीतिक नेतृत्व, सुरक्षा ढांचे और जनता की एकता के जरिए इस नेटवर्क को काट पाएगा, या फिर आने वाले सालों में यह देश भी “थर्ड वर्ल्ड पॉलिटिकल प्लेग्राउंड” बनकर रह जाएगा।

 

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