तहलका टुडे /मनोज शुक्ला
लखनऊ। लखनऊ की गलियों में कुछ हुनर ऐसे हैं, जो शोर नहीं करते, मगर अपनी महीन कारीगरी से दुनिया का ध्यान खींच लेते हैं। सफेद कपड़े पर उभरती चिकनकारी की बेल हो या जरदोजी की चमक, हर टांके में किसी कारीगर की मेहनत, किसी घर की उम्मीद और कई पीढ़ियों की विरासत छिपी है। मगर हुनर की अपनी दुनिया में भी रोजी-रोटी का सवाल सबसे बड़ा होता है। हाथों में कला हो, लेकिन काम अनियमित मिले; मेहनत पूरी हो, मगर मेहनताना कम—तो विरासत का भविष्य भी चिंता में पड़ जाता है।
इसी पृष्ठभूमि में लखनऊ-हरदोई क्षेत्र में प्रस्तावित 1,000 एकड़ का पीएम मित्र मेगा टेक्सटाइल पार्क उम्मीद का नया विषय बनकर सामने आया है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने करीब 1,947 करोड़ रुपये की परियोजना के मास्टर डेवलपर के चयन को मंजूरी दी है। सरकार का अनुमान है कि इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग एक लाख रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
लखनऊ के सांसद और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र में औद्योगिक विकास की इस पहल को स्थानीय कारोबार के विस्तार की दृष्टि से देखा जा रहा है। वहीं, आफताब-ए-शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी की चिकनकारी और जरदोजी के कारीगरों के उज्ज्वल भविष्य की कई बार मांग को ये उम्मीद जागी हैं कि विकास का लाभ उन हाथों तक पहुंचेगा, जिनके हुनर ने लखनऊ को पहचान दी है।
योगी सरकार का फैसला, उद्योग के लिए नया आधार
27 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में टेक्सटाइल पार्क के मास्टर डेवलपर के चयन को मंजूरी दी गई। रामकी इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को प्रेफर्ड बिडर के रूप में स्वीकृति मिली है।
पीएम मित्र योजना का उद्देश्य कपड़ा निर्माण, परिधान उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स जैसी गतिविधियों को एकीकृत औद्योगिक परिसर में विकसित करना है। प्रस्तावित पार्क में फैक्ट्री शेड, सड़क, बिजली, जलापूर्ति, वेयरहाउसिंग और कौशल विकास जैसी सुविधाएं विकसित करने की योजना है।
चिकनकारी और जरदोजी: हुनर को बाजार की तमन्ना पूरे होने के आसार
लखनऊ की चिकनकारी केवल कपड़े पर की गई कढ़ाई नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान है। जरदोजी भी ऐसी कला है, जिसमें धैर्य, बारीकी और पीढ़ियों से सीखा गया हुनर एक साथ दिखाई देता है। इनसे जुड़े कारीगरों और छोटे कारोबारियों के सामने नियमित काम, उचित पारिश्रमिक, डिजाइन में बदलाव और बड़े बाजारों तक पहुंच जैसी चुनौतियां रहती हैं।
टेक्सटाइल पार्क इस क्षेत्र के लिए अवसर बन सकता है, बशर्ते स्थानीय कारीगरों को आधुनिक बाजार से जोड़ने की ठोस व्यवस्था हो। डिजाइन प्रशिक्षण, उत्पाद की गुणवत्ता सुधार, ब्रांडिंग, डिजिटल बिक्री और निर्यातकों से संपर्क जैसी सुविधाएं विकसित की जाएं, तो पारंपरिक उत्पाद नए ग्राहकों तक पहुंच सकते हैं।
मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी की ओर से कारीगरों के उज्ज्वल भविष्य की मांग का मूल महत्व भी इसी पारंपरिक हुनर से जुड़े परिवारों को सम्मानजनक आजीविका और बेहतर भविष्य मिलेगा?
वफ़ा अब्बास ने फैसले को सराहा
इंडियन इंडस्ट्रीज चैम्बर ऑफ ट्रस्ट के चेयरमैन वफ़ा अब्बास ने सरकार के इस फैसले की सराहना की है। चीन और जापान के दौरे से लौटे वफ़ा अब्बास के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय उद्योग की प्रतिस्पर्धा, आधुनिक तकनीक, गुणवत्ता और बाजार तक पहुंच जैसे विषय खास महत्व रखते हैं।
आज वैश्विक बाजार में केवल अच्छा उत्पाद बनाना पर्याप्त नहीं है। समय पर आपूर्ति, आकर्षक डिजाइन, भरोसेमंद गुणवत्ता और खरीदारों से मजबूत संबंध भी जरूरी हैं। यदि लखनऊ के उद्यमियों और कारीगरों को इन व्यवस्थाओं से जुड़ने का अवसर मिलता है, तो चिकनकारी और जरदोजी के कारोबार के विस्तार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र में रोजगार की उम्मीद
सरकार ने टेक्सटाइल पार्क से करीब एक लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान लगाया है। कपड़ा निर्माण, कटिंग, सिलाई, फिनिशिंग, गुणवत्ता जांच, पैकेजिंग, गोदाम और परिवहन जैसे क्षेत्रों में काम के अवसर बन सकते हैं।
परियोजना में कौशल विकास संस्थान और महिला कामगारों के लिए हॉस्टल जैसी सुविधाओं की भी योजना है। इससे युवाओं और महिलाओं को औद्योगिक क्षेत्र में भागीदारी का अवसर मिल सकता है। चिकनकारी करने वाली महिलाओं और घरेलू कारीगरों तक लाभ पहुंचाने के लिए उचित भुगतान, नियमित काम और बाजार से सीधा संपर्क का फायदा मिलेगा
₹1,947 करोड़ की परियोजना के सामने असली कसौटी
परियोजना की अनुमानित लागत 1,947 करोड़ रुपये है। केंद्र सरकार से लागत का 30 प्रतिशत तक, अधिकतम 500 करोड़ रुपये की सहायता का प्रावधान बताया गया है। निर्माण अवधि पांच वर्ष निर्धारित बताई गई है।
अब चुनौती है कि औद्योगिक ढांचा समय पर विकसित हो, निवेशक आएं और स्थानीय लोगों को वास्तविक अवसर मिलें। पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन और औद्योगिक अपशिष्ट के उपचार पर भी ध्यान देना होगा।
लखनऊ की चिकनकारी को नई उड़ान देने का अर्थ केवल बड़े कारखाने खड़े करना नहीं, बल्कि उन कारीगरों की जिंदगी में भी बदलाव लाना है, जिनकी उंगलियों ने इस शहर की पहचान बुनी है। योगी सरकार की इस परियोजना की सफलता का आकलन अंततः इसी कसौटी पर होगा कि उद्योग बढ़ने के साथ कारीगरों की आमदनी, सम्मान और भविष्य में कितना सुधार आता है।




