तहलका टुडे टीम / सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
लखनऊ की फ़िज़ाओं में इन दिनों मोहर्रम का ग़म भी है, इबादत भी है और इंसानियत का वह पैग़ाम भी, जो सदियों से इस शहर की पहचान रहा है। ऐसे माहौल में एक तस्वीर ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यह सिर्फ़ एक पेंटिंग नहीं थी, बल्कि मोहब्बत, एहतराम, भाईचारे और हिंदुस्तान की साझा विरासत का खूबसूरत इज़हार थी।
करामत हुसैन मुस्लिम गर्ल्स कॉलेज, लखनऊ की बी.ए. अंतिम वर्ष की छात्रा लक्ष्मी सिंह ने अंतरराष्ट्रीय मोहर्रम प्रदर्शनी में ख़ाना-ए-काबा के गिलाफ़ पर अंकित पवित्र इबारतों को अपनी कैलीग्राफी और चित्रकला के माध्यम से जिस ख़ूबसूरती से प्रस्तुत किया, उसने हर आने वाले को रुककर देखने पर मजबूर कर दिया।
मोहर्रम का महीना, उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार और एक हिंदू छात्रा द्वारा काबा की पवित्रता को अपने कैनवास पर उतारना — यह दृश्य अपने आप में उस भारत की तस्वीर पेश करता है, जिसकी बुनियाद विविधता में एकता और परस्पर सम्मान पर टिकी हुई है।
प्रदर्शनी में आने वाले लोगों ने जब लक्ष्मी की बनाई कलाकृति देखी तो सिर्फ़ उसकी कलात्मकता की तारीफ़ नहीं की, बल्कि उस बच्ची की सोच, उसके जज़्बे और उसकी मोहब्बत को भी सलाम किया। कई लोगों ने कहा कि यह पेंटिंग सिर्फ़ रंगों और लकीरों का मेल नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाला एक पैग़ाम है।
लक्ष्मी सिंह पिछले तीन वर्षों से इस प्रदर्शनी में हिस्सा ले रही हैं। पहले उन्होंने आयतुल कुर्सी और क़ुरआन की अन्य आयतों को कैलीग्राफी के माध्यम से प्रस्तुत किया था। इस वर्ष उन्होंने गिलाफ़-ए-काबा की इबारतों को अपने फ़न का विषय बनाया। उनके हाथों की बारीकी और अक्षरों की नफ़ासत देखकर लोग हैरान रह गए।
लेकिन इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात उनकी कला नहीं, बल्कि उसकी नीयत है।
लक्ष्मी का कहना है कि उन्होंने यह कलाकृति देश में अमन, भाईचारे और इंसानों के बीच मोहब्बत के संदेश को मज़बूत करने के लिए बनाई। उन्होंने दुआ की कि भारत हमेशा एकता और सद्भाव की मिसाल बना रहे।
शायद यही वजह थी कि जो भी इस पेंटिंग के सामने रुका, उसने सिर्फ़ तस्वीर नहीं देखी, बल्कि उस भावना को महसूस किया जो उसके पीछे थी। और फिर अनायास ही उसके होंठों से दुआ निकली — इस बच्ची के लिए, उसके भविष्य के लिए और उस सोच के लिए जो नफ़रत की दीवारों के बजाय मोहब्बत के पुल बनाना जानती है।
आज जब दुनिया के कई हिस्सों में धर्म और पहचान के नाम पर दूरियां पैदा करने की कोशिशें होती हैं, तब लखनऊ की एक छात्रा अपने क़लम और रंगों से यह याद दिला रही है कि फ़न का कोई मज़हब नहीं होता, लेकिन अच्छा फ़न इंसानियत का मज़हब ज़रूर सिखाता है।
लक्ष्मी सिंह की यह पेंटिंग सिर्फ़ प्रदर्शनी की एक कलाकृति नहीं, बल्कि लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीवंत दस्तावेज़ है। यह उस भारत की तस्वीर है जहां मंदिर की घंटियां और अज़ान की सदाएं एक ही आसमान के नीचे गूंजती हैं, जहां मोहर्रम की प्रदर्शनी में एक हिंदू बेटी काबा की इबारतें लिखती है और उसे देखकर हर धर्म का इंसान उसके लिए दुआ करता है।
ऐसी सोच को सलाम।
ऐसी फ़िक्र को सलाम।
ऐसी बेटियों को सलाम, जो अपने फ़न से दिल जीत लेती हैं और इंसानियत को और ख़ूबसूरत बना देती हैं। ❤️🇮🇳
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