तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव
लखनऊ। लगभग 366 बीघा भूमि वाले वक्फ नवाब अच्छे मिर्ज़ा (अलल औलाद) की मुतवल्ली नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड, हाईकोर्ट और अवमानना कार्यवाही तक पहुंच चुका है। याची सिब्तैन रिजवी का आरोप है कि बोर्ड ने न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के अनुरूप वास्तविक विचार करने के बजाय पहले जैसा ही आदेश दोबारा पारित कर दिया और अंततः वक्फ को अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण में लेकर धारा 65 के अंतर्गत प्रशासकीय व्यवस्था लागू कर दी।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी विवाद क्यों बढ़ा?
याची के अनुसार, हाईकोर्ट ने 12 मार्च 2026 को स्पष्ट निर्देश दिया था कि बोर्ड 18 अगस्त 2025 के अपने पत्र तथा 10 अक्टूबर 2025 की जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी की सत्यापन रिपोर्ट पर विधिसम्मत विचार करते हुए निर्णय ले। इसके बावजूद पहले पारित आदेश को ही नए रूप में दोहरा दिया गया।
₹5,000 की लागत लगाने के बाद भी उठा नया विवाद
अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि उसके आदेश का अपेक्षित अनुपालन नहीं हुआ है। अनुपालन हलफनामा अस्वीकार करते हुए बोर्ड पर ₹5,000 की लागत लगाई गई। इसके बाद बोर्ड ने नया आदेश पारित किया, लेकिन याची का आरोप है कि उसमें भी मूल निर्णय और तर्क लगभग यथावत रखे गए।
366 बीघा संपत्ति को लेकर सवाल
याची का कहना है कि विवाद केवल मुतवल्ली नियुक्ति का नहीं, बल्कि 366 बीघा मूल्यवान वक्फ संपत्ति के नियंत्रण और प्रबंधन का है। उनका आरोप है कि वक्फ को सीधे बोर्ड के नियंत्रण में लेने और प्रशासकीय व्यवस्था लागू करने से पारदर्शिता तथा संपत्ति के संरक्षण को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं।
हालांकि, बोर्ड का कहना है कि परिवार में विवाद, सहमति के अभाव और वक्फ हित को देखते हुए यह निर्णय लिया गया।
प्रशासनिक नियंत्रण बनाम वक्फ हित
मामले में यह भी बहस का विषय है कि—
- क्या वक्फ को सीधे बोर्ड के नियंत्रण में लेना आवश्यक था?
- क्या मुतवल्ली नियुक्ति पर निर्णय से पहले सभी वैधानिक पहलुओं पर समुचित विचार किया गया?
- क्या हाईकोर्ट के निर्देशों का वास्तविक अनुपालन हुआ?
इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर न्यायालय की आगामी कार्यवाही से ही स्पष्ट होगा।
आज की सुनवाई महत्वपूर्ण
मामला पुनः इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ पीठ में सूचीबद्ध है। बताया जा रहा है कि चेयरमैन अली जैदी और सीईओ जीशान रिजवी की व्यक्तिगत उपस्थिति से संबंधित कार्यवाही भी प्रस्तावित है।
यह सुनवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि हाल ही में एक अन्य अवमानना प्रकरण में वक्फ ट्रिब्यूनल द्वारा सीईओ जीशान रिजवी को एक माह के सिविल कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है, जिस पर आगे की न्यायिक कार्यवाही लंबित है।
अब सबकी नजर हाईकोर्ट पर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि न्यायालय यह पाता है कि उसके आदेश का वास्तविक अनुपालन नहीं हुआ, तो अवमानना की कार्यवाही और गंभीर रूप ले सकती है। दूसरी ओर, यदि बोर्ड अपने निर्णय को विधिसम्मत सिद्ध करने में सफल रहता है, तो विवाद का नया कानूनी अध्याय सामने आएगा।
फिलहाल, 366 बीघा वक्फ नवाब अच्छे मिर्ज़ा की संपत्ति, मुतवल्ली नियुक्ति और न्यायालय के आदेशों के अनुपालन को लेकर उठे सवाल पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बने हुए हैं।




