भाग–1 दुलारी से मलका-ए-जमानी तक : जिस खातून की आखिरी पनाहगाह उसी इमामबाड़े में बनी, जिसकी दीवारें आज अपने लिए इंसाफ मांग रही हैं
तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफा
लखनऊ को अगर सिर्फ एक शहर कहा जाए तो शायद लखनऊ के साथ नाइंसाफी होगी।
यह शहर एक किताब है।
ऐसी किताब जिसके कुछ पन्ने महलों में हैं, कुछ इमामबाड़ों में, कुछ कब्रों के सिरहाने और कुछ उन गलियों में, जिनसे रोज हजारों लोग गुजरते हैं और शायद उन्हें मालूम भी नहीं होता कि उनके कदमों के नीचे कोई सदियों पुरानी कहानी सो रही है।
गोलागंज की एक ऐसी ही गली में जाकर लगता है कि लखनऊ ने अपने अतीत को किसी पुराने संदूक में रखकर भूल गया है।
लेकिन संदूक खुलता है तो उसमें से सिर्फ धूल नहीं निकलती।
एक नाम निकलता है—
मलका-ए-ज़मानी।
दुलारी से हुसैनी और फिर शाही खिताब मलका-ए-जमानी तक पहुंचने वाली इस खातून की कहानी अवध के दरबार की कहानी जरूर है, लेकिन सिर्फ दरबार की कहानी नहीं।
यह उस दौर की कहानी है जिसमें शाही हैसियत के साथ धार्मिक और सामाजिक सरपरस्ती भी जुड़ी हुई थी।
कर्बला के शहीदों की याद से बनी वह रवायत जिसमें दर्द सिर्फ आंसू नहीं होता, बल्कि इंसान के काम आने की जिम्मेदारी भी बन जाता है।
मलका-ए-जमानी की धार्मिक-सामाजिक सरपरस्ती से संबंधित उपलब्ध सामग्री में जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। यानी उनकी पहचान को सिर्फ महल और ताज के आईने में देखना इस कहानी को छोटा कर देना होगा।
वह दौर गुजर गया।
शाही दरबार खत्म हो गए।
लेकिन कुछ चीजें पीछे रह गईं।
इमामबाड़े।
मस्जिदें।
कर्बला।
मजारें।
और लोगों की याद।
गोलागंज में खड़ी हुई एक इमारत
फिर उस कहानी ने गोलागंज की जमीन पर एक आकार लिया।
मलका-ए-जमानी का इमामबाड़ा।
‘शहर-ए-लखनऊ’ में इसका जो वर्णन मिलता है, वह आज पढ़ते हुए किसी पुराने ख्वाब जैसा लगता है।
इमामबाड़ा अपने समय के किसी भी इमामबाड़े से कम खूबसूरत नहीं था।
उसके दाहिनी तरफ मस्जिद थी।
सामने पांच दरवाजे कतार में थे।
लाखौरी ईंटों की लगभग साढ़े चार फुट मोटी दीवारें थीं।
छतों के विशाल शहतीर थे।
फिर समय बीतता गया।
इमारत का बड़ा हिस्सा खत्म होता गया।
कहीं मकान बन गए।
कहीं दीवारें मिट्टी में दब गईं।
कहीं शहतीर गायब हो गए।
और इतिहास धीरे-धीरे आंखों के सामने से उतरता चला गया।
लेकिन इस कहानी का सबसे मार्मिक अध्याय अभी बाकी था।
22 दिसंबर 1843।
मलका-ए-जमानी का इंतकाल हुआ।
और उन्हें किसी दूसरे मकबरे में नहीं, बल्कि उसी इमामबाड़े में दफन किया गया जो उनके नाम से जाना जाता था।
सोचिए।
एक ऐसी महिला जिसने जिंदगी में शाही वैभव देखा होगा, उसके लिए आखिर में कोई महल नहीं बचा।
उसका आखिरी आशियाना वही इमामबाड़ा बना।
वही इमारत।
वही जमीन।
वही चारदीवारी।
और शायद वही लोग जिन्होंने कभी उनकी जिंदगी में रोशनी देखी थी, उनकी मौत के बाद उसी जगह पर आंसू लेकर खड़े हुए होंगे।
फिर वक्त बदला
अवध का आसमान बदला।
हुकूमत बदली।
शहर बदला।
और फिर 1857 आया।
लेकिन यहां इतिहास के साथ ईमानदारी जरूरी है।
मलका-ए-जमानी 1857 तक जीवित नहीं थीं।
उनका इंतकाल 1843 में हो चुका था।
लेकिन क्या किसी इंसान का इतिहास उसकी मौत की तारीख पर खत्म हो जाता है?
नहीं।
कभी-कभी इंसान चला जाता है और उसकी बनाई हुई संस्थाएं, इमारतें और सामाजिक विरासत आगे चलती रहती हैं।
मलका-ए-जमानी की कहानी भी इसी विरासत की कहानी है।
उनकी इमारत उस लखनऊ का हिस्सा बनी रही जिसने बाद में 1857 का तूफान देखा।
यही वजह है कि उनकी कहानी को 1857 की तलवार से नहीं, 1857 से पहले के उस सामाजिक-सांस्कृतिक लखनऊ की जमीन से समझना चाहिए जिसने प्रतिरोध, धार्मिकता और इंसानी रिश्तों की एक पूरी दुनिया बनाई थी।
लेकिन असली सवाल अब शुरू होता है
आज अगर कोई उस गली में पहुंचता है तो क्या उसे मालूम होगा कि यहां कभी एक शानदार इमामबाड़ा था?
क्या कोई बताएगा कि यहां पांच दरवाजे थे?
क्या कोई बताएगा कि दाहिनी तरफ मस्जिद थी?
क्या कोई बताएगा कि लाखौरी ईंटों की मोटी दीवारें थीं?
और क्या कोई यह बताएगा कि—
यहीं मलका-ए-जमानी दफन हैं?
यही वह सवाल है जहां इतिहास अचानक वर्तमान से टकराता है।
क्योंकि अगर किसी जगह पर किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की आखिरी आरामगाह मौजूद है, तो वह सिर्फ जमीन नहीं रह जाती।
वह अमानत बन जाती है।
और अमानत की सबसे पहली जरूरत होती है—
हिफाजत।
आगे जारी…..




