तहलका टुडे टीम
नई दिल्ली/लखनऊ/हैदराबाद/पटना/बाराबंकी | स्पेशल रिपोर्ट
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) की इकलौती सुपुत्री,
सैय्यदा हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा,
जिन्हें मुसलमानों की माँ का दर्ज़ा हासिल है, उनके शहादत दिवस के अवसर पर
पूरा भारत गहरे शोक में डूबा हुआ है।
देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों में मजलिसों, नौहों, जुलूसों और मातमी कार्यक्रमों का गहरा माहौल देखने को मिला, जहाँ लाखों श्रद्धालुओं ने ग़म-ए-ज़हरा में अश्क बहाए।
माँ हज़रत फ़ातेमा ज़हरा कौन थीं?
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स.अ.) वह पवित्र हस्ती हैं जिनकी महानता केवल पैग़म्बर की बेटी होने से नहीं,
बल्कि अल्लाह की नज़र में उनके उच्च स्थान, वक़ार, पवित्रता और रूहानी क़ुरबत से है।
उनका ईमान, उनका चरित्र, उनका सब्र और उनका आध्यात्मिक मुक़ाम इस्लामी इतिहास में बेजोड़ है।
लेकिन यह भी एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि:
- पैग़म्बर (स.अ.) के निधन के कुछ ही दिनों बाद
- इस्लाम के तथाकथित दावेदारों ने
- उनके घर को घेरकर उन पर अत्याचार किए।
इतिहास में दर्ज है कि:
- उनके घर का दरवाज़ा आग से जलाकर गिराया गया
- दरवाज़ा और दीवार के बीच दबने से उनका अजन्मा शिशु शहीद हो गया
- उन्हें चोटें लगीं और वह बिस्तर पर जा पड़ीं
- उनके वैधानिक और धार्मिक अधिकार (फ़दक) उनसे छीन लिए गए
अपने हक़ और न्याय के लिए उन्होंने मस्जिद-ए-नबवी में ऐतिहासिक और भावुक भाषण दिया,
जहाँ उन्होंने कुरआनी तर्कों के साथ तथ्य उजागर किए।
लेकिन सत्ता के मद में डूबे लोग उनकी आवाज़ को अनसुना कर के वापस लौट आए।
गहरा दिल टूटने के बाद, वह घर लौटीं —
और मरते दम तक उनसे बात नहीं की जिन्होंने उनके ऊपर अत्याचार किए थे।
यही वह दर्दनाक पृष्ठभूमि है जिसने दुनिया भर में सैय्यदा फ़ातेमा (स.अ.) की शहादत को
एक अत्यंत संवेदनशील, ऐतिहासिक और मातमी घटना बना दिया है।
राजधानी दिल्ली — जुलूस और पाँच दिनों से लगातार शोक सभाएँ
दिल्ली में मंगलवार को हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स.अ.) की याद में
जुलूस, क़ुरआनख़वानी और मजलिसों का आयोजन हुआ।
कई इलाक़ों में पिछले पाँच दिनों से लगातार मातमी प्रोग्राम जारी हैं।
लखनऊ — इमामबाड़ों और कर्बला में जनसैलाब
लखनऊ में गार वाली कर्बला, बड़ा-छोटा इमामबाड़ा,
दर्गाह हज़रत अब्बास और सिब्तैनाबाद इमामबाड़ा, काला इमामबाड़ा में
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।
- ताबूत और अलम के जुलूस
- नौहे
- मातमी सीनाज़नी
- और इमाम-ए-ज़माना (अ.फ.) के दर पर मजलिसें
लोगों ने बड़े इख़लास से अंजाम दीं।
भारत के शीर्ष धर्मगुरुओं की मौजूदगी
मजलिसों में भारत की प्रमुख धार्मिक हस्तियाँ शामिल रहीं—
- आफताबे शरीअत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी साहब
- रहबर-ए-हिंद मौलाना सैयद सफी हैदर जैदी साहब
- मौलाना मोहम्मद मियां आब्दी साहब
इनकी मौजूदगी में हज़ारों की भीड़ ने ग़म-ए-ज़हरा (स.अ.) में शिरकत की।
🏴 बाराबंकी की सरज़मीन — देवा शरीफ़ से सैयदवाड़ा तक मातमी माहौल
“पवित्र नगर बाराबंकी” में करबला सिविल लाइन्स ,गुलाम अस्करी हाल,इमामबाड़ा मीर मासूम अली ,जैदपुर,कित्तूर,देवा शरीफ़, मझगांवा और सैयदवाड़ा में
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली।
यहाँ स्थित हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की 27वीं पुश्त
हाजी वारिस अली शाह चिश्ती के रौज़े पर दिनभर ज़ायरीन आते रहे।
🕌 सुन्नी समुदाय भी शोक कार्यक्रमों में शामिल
सुन्नी मुसलमानों ने भी
कई ऐतिहासिक मस्जिदों, शहमीना और सूफ़ी दरगाहों पर
क़ुरआनख़वानी, फ़ातेहा और दुआओं का आयोजन किया,
जो भारतीय समाज की गंगा-जमुनी तहज़ीब का उदाहरण है।
नजफ़-कर्बला से लेकर दुनिया भर में मातम
इराक़ के नजफ़ और कर्बला में लाखों श्रद्धालु
हज़रत फ़ातेमा (स.अ.) का शोक मना रहे हैं।
दुनिया के अन्य देशों— ईरान, लेबनान, सीरिया,अमेरिका , यूके, यूएस, अफ्रीका
हर जगह मजलिसें और मातमी जुलूस जारी हैं।
🕯️हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स.अ.) की शहादत
सिर्फ़ एक ऐतिहासिक घटना नही
बल्कि हक़, इंसाफ़, सब्र और इस्लामी इतिहास के सबसे पवित्र अध्याय में से एक है।
सिर्फ़ एक ऐतिहासिक घटना नही
बल्कि हक़, इंसाफ़, सब्र और इस्लामी इतिहास के सबसे पवित्र अध्याय में से एक है।
भारत में जिस व्यापक एकता और सम्मान के साथ
ग़म-ए-ज़हरा (स.अ.) मनाया जा रहा है,
वह देश की आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विविधता का बेहतरीन प्रमाण है।




