हसनैन मुस्तफा
लखनऊ:इल्म (ज्ञान) वह रौशनी है जिसने हमेशा इंसानियत को तरक़्क़ी की राह दिखाई है। जब दुनिया अंधेरे में डूब रही थी, तब किताबों ने इंसानों को सभ्यता, तहज़ीब, अख़लाक़ और तरक्की का रास्ता दिखाया। इसी रौशनी की सबसे मजबूत किरणों में से एक है— अल्लामा शिब्ली नोमानी पुस्तकालय, नदवतुल उलेमा, लखनऊ।
भारत का यह वह अनमोल संस्थान है जिसे दुनिया के हर कोने से विद्यार्थी, शोधकर्ता, उलेमा, और इल्म-ओ-अदब के चाहने वाले लोग सिर्फ एक मकसद से आते हैं— इल्म की तलाश में झुकने, सीखने और समझने के लिए।
📍 स्थापना का इतिहास — एक ख़्वाब जो हक़ीक़त बना
इस पुस्तकालय की असल नींव 1899 ई. में रखी गई थी। पहले यह गोला गंज के पुराने भवन में था, फिर 1908 ई. में इसे अब्बासिया हॉल में स्थानांतरित किया गया। लेकिन इल्म की इस नदी को और जगह चाहिए थी।
2 नवंबर 1975 को हज़रत मौलाना सैयद अबुल हसन अली हसनी नदवी (अली मियां) के प्रबंधकाल में संयुक्त अरब अमीरात के मुख्य न्यायाधीश शैख़ अहमद बिन अब्दुल अज़ीज़ आल-मुबारक ने इसकी पांच मंज़िला भव्य इमारत का शिलान्यास किया, और
28 फ़रवरी 1984 को इसका शानदार उद्घाटन हुआ।
यह पुस्तकालय अल्लामा शिब्ली नोमानी के नाम से मंसूब है— जिनका सपना एक महान और आदर्श पुस्तकालय बनाना था। आज यह सपना सिर्फ पूरा ही नहीं, बल्कि दुनिया के सामने एक मिसाल बन चुका है।
📚 खज़ाना-ए-इल्म — जहां इतिहास सांस लेता है
इस पुस्तकालय में:
2.25 लाख से अधिक मुद्रित पुस्तकें
5,000 से ज्यादा अरबी, फ़ारसी और उर्दू के दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथ (Makhṭūtāt)
कई अत्यंत दुर्लभ और अद्वितीय संस्करण
अस्त्रोलैब (औरंगज़ेब आलमगीर के दौर का)
यहाँ रखे हस्तलिखित ग्रंथों में दुनिया में सिर्फ यहीं उपलब्ध बहुमूल्य नुस्खे शामिल हैं:
दीवान-ए-मुसहफ़ी
दीवान-ए-बरहमन
दीवान-ए-सबा
दीवान-ए-शैदा
रशीद मुन्तज़िर के पूर्ण दीवान की दुनिया में एकमात्र प्रति
शाहनामा-ए-फ़िरदौसी का रंगीन चित्रित संस्करण— जिसमें कीमती पत्थरों से बनाए गए रंग प्रयोग किए गए हैं।
अजायिबुल मख़लूक़ात का बेहतरीन चित्रांकित नुस्खा भी इस पुस्तकालय की शान बढ़ाता है।
🌍 दुनिया का वह पुस्तकालय जहां धर्म, जाति और सरहद की कोई दीवार नहीं
लाइब्रेरियन मौलाना मोहम्मद फ़ैज़ान नगरामी नदवी साहब कहते हैं:
> “अल्लामा शिब्ली नोमानी पुस्तकालय वह जगह है जहां इंसानियत पहले है और जाति–धर्म बाद में। इल्म का कोई धर्म नहीं होता। जो भी यहाँ आता है—चाहे हिंदू हो, मुस्लिम, सिख, ईसाई, छात्र हो या प्रोफेसर—उसे खुले दिल से स्वागत मिलता है।”
“यह लाइब्रेरी सिर्फ किताबों का ढेर नहीं, बल्कि हमारी तहज़ीबी, तालीमी और इल्मी विरासत की धड़कन है। दुनिया के हर कोने से लोग आते हैं, कोई ईरान से, कोई इराक से, कोई मिस्र से, कोई यूरोप या अमेरिका से—सभी एक ही मकसद के साथ: हक़ीक़त को खोजने और इल्म से रोशन होने के लिए।”
🔎 डिजिटल क्रांति और आधुनिक सुविधाएँ
सभी हस्तलिखित ग्रंथों की डिजिटल पृष्ठ-दर-पृष्ठ कॉपी उपलब्ध
ब्रेल लिपि में पुस्तकें दृष्टिबाधित लोगों के लिए
10,440 से अधिक महान विद्वानों के निजी पुस्तक-संग्रह
पुरालेखीय दस्तावेज़, शोध सामग्री और पत्र पत्रिकाएँ
1925–1985 तक मौलाना अब्दुल माजिद दरियाबादी के पत्रों की डिजिटल श्रृंखला
🎓 यह सिर्फ एक लाइब्रेरी नहीं, बल्कि एक ज़िंदा यूनिवर्सिटी है
यह वह स्थान है जहां:
इतिहास बोलता है,
संस्कृतियाँ मिलती हैं,
विचार टकराते नहीं—बल्कि साथ चलते हैं।
यह पुस्तकालय धार्मिक, ऐतिहासिक, अदबी, वैज्ञानिक और शोधकारी पुस्तकों का अद्वितीय केंद्र है जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी मिसाल आप है।
अल्लामा शिब्ली नोमानी पुस्तकालय सिर्फ नदवा की शान नहीं, बल्कि पूरे भारत और दुनिया की बौद्धिक विरासत का चमकता हुआ तारा है।
यह वह जगह है जहाँ किताबें वक़्त को रोक लेती हैं, और रूहें सुकून पाती हैं।
जहाँ इल्म का समंदर बहता है और हर आने वाला मोती लेकर लौटता है।
“यह लाइब्रेरी हमारी पहचान है, हमारी विरासत है, और हमारी आने वाली नस्लों का सबसे कीमती तोहफा है।”
मौलाना मोहम्मद फ़ैज़ान नगरामी नदवी
💫 अल्लामा शिब्ली नोमानी लाइब्रेरी
“जहाँ इल्म इबादत है और किताबें मार्गदर्शक।”
“जहाँ नफरत मर जाती है और इंसानियत जीत जाती है।”





