सत्ता के गलियारे से झाड़-फूँक जनाब की रिपोर्ट
लखनऊ:एक ज़माना था जब
मायावती के दरबार में
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम लिया जाता था तो अफ़सर कुर्सी सीधी कर लेते थे।
और अखिलेश यादव के दौर में
आज़म ख़ान का जलवा ऐसा था कि सरकार भी पहले सोचती थी—बाद में बोलती थी।
तब दोनों की हैसियत इतनी भारी थी कि
आज के उपमुख्यमंत्री उस दौर में
राजनीति के इंटरन लगते।
लेकिन सत्ता का मौसम बदला
तो राजनीति का मिज़ाज भी बदल गया।
🧳 बसपा गई, कांग्रेस आई… फिर कांग्रेस भी गई
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा छोड़ी—
सोचा था कांग्रेस में
फिर वही रुतबा,
वही भीड़,
वही डर।
मगर कांग्रेस में उन्हें देखकर लगा कि
यहाँ न तो कोई मायावती है,
न कोई अखिलेश,
और न ही कोई पूछने वाला।
ऊपर से
आय से अधिक संपत्ति,
CBI की जांच,
ED की दस्तक—
ऐसे में कांग्रेस को भी समझ आ गया कि
यह “नेता” कम,
फाइल ज़्यादा है।
नतीजा?
👉 नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस भी छोड़ दी।
या कह लें—
कांग्रेस ने सुकून की नींद ली।
🎭 अब अगला मंच कौन सा?
अब सवाल उठता है—
क्या नसीमुद्दीन सिद्दीकी
फिर से मायावती की छाया में लौटेंगे?
या भाजपा की रणनीति का
एक सॉफ्ट टूल बनेंगे?
या फिर
आज़म ख़ान के जेल जाने के बाद
समाजवादी पार्टी को
मुस्लिम राजनीति के नाम पर
एक नया चेहरा चाहिए—
जो बोले,
जो लड़े,
जो जांच झेले,
और ज़रूरत पड़े तो
बलि का बकरा भी बन जाए?
क्योंकि सपा को भी पता है—
राजनीति में
भीड़ चाहिए,
शोर चाहिए,
और कभी-कभी
एक ऐसा नाम भी चाहिए
जिस पर सारा बोझ डालकर
पार्टी खुद बच जाए।
🪞 सियासत का आईना
यही है उत्तर प्रदेश की राजनीति का कड़वा सच—
मायावती के राज में
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ताक़त थे।
आज वही
ठिकाने ढूँढ रहे हैं।
अखिलेश के दौर में
आज़म ख़ान आवाज़ थे।
आज वही
सलाखों के पीछे हैं।
और राजनीति?
वो हमेशा की तरह ज़िंदा है—
क्योंकि यहाँ
नेताओं का इस्तेमाल होता है,
सम्मान नहीं।




