27 शाबान की सुबह — जब जामा मस्जिद से उठा नूर का कारवां मीर अनीस की मज़ार पर पहुंचा

“From Jama Masjid to Mir Anees: A Tribute Where History, Poetry and Devotion United”

Tahalka Today
Tahalka Today - Tahalka Today World News Channel
7 Min Read

तहलका टुडे टीम/मोहम्मद मेहदी “जौन”

लखनऊ की एक सुबह…
मीर अनीस की कब्र फूलों से सज गई।
फ़ातिहा की धीमी आवाज़ें हवा में घुल गईं।
मजलिस की सदा ने फिज़ा को रूहानी बना दिया।
और उनके अशआर के जरिए पेश किया गया ख़िराज-ए-अक़ीदत।

27 शाबान, इतवार की वह सुबह लखनऊ की तारीख़ में जैसे दर्ज हो गई। जामा मस्जिद लखनऊ में नमाज़ और मजलिस के बाद जब दुआ के लिए हाथ उठे, तो वह सिर्फ़ इबादत नहीं थी—वह एक एहद था, एक इरादा था, एक नई तहरीक का जन्म था।

यह लोग मीर अनीस के खानदान से नहीं थे।
न कोई नस्बी रिश्ता, न कोई दुनियावी ताल्लुक़।

लेकिन एक रिश्ता था—
हज़रत Husayn ibn Ali से।

उसी इमाम से, जिनकी मोहब्बत में डूबकर उर्दू अदब के अज़ीम मरसिया-निगार Mir Babar Ali Anees ने अपने कलाम से कर्बला को अमर कर दिया।

और यही मोहब्बत का रिश्ता इन अज़ादारों को एक साथ ले आया—उस शायर की कब्र पर, जिसने हुसैनियत के पैग़ाम को हर दिल तक पहुंचाया।

🌹 तहरीक-ए-नूर-ए-अमल — जामा मस्जिद लखनऊ से उठी एक रूहानी पुकार

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की विलादत के मुबारक महीने में, दिलों ने यह तय किया कि याद को सिर्फ़ ज़बान तक सीमित नहीं रखा जाएगा—उसे अमल में बदला जाएगा।

इसी जज़्बे के साथ “तहरीक-ए-नूर-ए-अमल, जामा मस्जिद लखनऊ” के बैनर तले, मिशन के संयोजक शाहकार जैदी के तत्वाधान में मोमिनीन का कारवां मज़ार-ए-अनीस की ओर रवाना हुआ।

यह सफ़र सिर्फ़ कदमों का नहीं था—
यह दिलों का सफ़र था।
यह याद से अमल तक का सफ़र था।

जब मज़ार पर पहुंचा मोहब्बत का कारवां

सुबह की ठंडी हवा में गुलाब की खुशबू घुली हुई थी।
मज़ार को फूलों से सजाया गया।
फ़ातिहा पढ़ी गई।
मजलिस बरपा हुई।

जब अनीस के मरसिये पढ़े गए तो ऐसा लगा जैसे सदियां सिमट कर उसी पल में आ गई हों। कर्बला की तपती रेत, अली अकबर की जवानी, हज़रत अब्बास का अलम—और इमाम हुसैन (अ.स.) का सब्र—सब कुछ जैसे आंखों के सामने जीवंत हो उठा।

दुआ के लिए उठे हाथों में सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं थे—
आंसू भी थे, एहसास भी थे और वह मोहब्बत भी थी जो नस्लों को जोड़ देती है।

क्यों शाबान में याद आए मीर अनीस?

शाबान सिर्फ़ खुशियों का महीना नहीं—
यह उस अज़ीम क़ुर्बानी की याद का महीना है जिसने इंसानियत को सिर उठाकर जीना सिखाया।

मीर अनीस ने अपने सैकड़ों मरसियों और हज़ारों अशआर के जरिए कर्बला को सिर्फ़ एक तारीखी वाक़िआ नहीं रहने दिया—बल्कि उसे सब्र, वफ़ा और इंसाफ़ का ज़िंदा पैग़ाम बना दिया।

उनकी शायरी में मंजरकशी ऐसी कि आंखें नम हो जाएं,
किरदार-निगारी ऐसी कि दिल कांप उठे,
और जज़्बात ऐसे कि इंसान खुद को उस मैदान में खड़ा महसूस करे।

इसीलिए जब शाबान में दिल हुसैन (अ.स.) की याद में रौशन होते हैं, तो मीर अनीस भी याद आते हैं—क्योंकि उन्होंने उस याद को आवाज़ दी, अल्फ़ाज़ दिए, आंसुओं को अर्थ दिया।

मीर अनीस कौन थे?

मीर बबर अली अनीस (1802–1874) उर्दू शायरी के वह आफ़ताब हैं जिनका नाम लेते ही मरसिया-निगारी की पूरी तारीख़ रोशन हो उठती है। उनका जन्म फैजाबाद में हुआ और परवरिश लखनऊ की उसी तहज़ीब में हुई, जिसने अदब, अज़ादारी और इल्म को एक साथ पनाह दी।

उनके वालिद मीर ख़लीक़ भी बड़े शायर थे। उसी अदबी माहौल में अनीस ने बचपन से कर्बला के वाक़िआत को अपने कलाम का हिस्सा बनाया और मरसिये को नई बुलंदी अता की।

अवध की नवाबी तहज़ीब के दौर में, जब ज़बान की नफ़ासत और महफ़िलों की रौनक अपने उरूज पर थी, अनीस ने मरसिये को महज़ बयान से आगे बढ़ाकर एक मुकम्मल अदबी शाहकार बना दिया।

उन्होंने इमाम हुसैन (अ.स.), हज़रत अब्बास, अली अकबर और क़ासिम की शख्सियत को इस अंदाज़ में पेश किया कि पढ़ने वाला खुद को कर्बला के मैदान में मौजूद महसूस करे।

उन्होंने सैकड़ों मरसिये लिखे। उनके अशआर की तादाद हज़ारों में है। उनके कई मजमूए आज भी मजलिसों में पढ़े जाते हैं। मीर अनीस और मिर्ज़ा दबीर का अदबी मुकाबला उर्दू इतिहास का सुनहरा अध्याय है।

उनका कलाम सिर्फ़ एक मसलक तक सीमित नहीं—वह उर्दू अदब की साझा विरासत है।

उलेमा और अहबाब की मौजूदगी

इस रूहानी महफिल में मौलाना एजाज साहब, मौलाना वासिफ रज़ा साहब, मौलाना जावेद मुस्तफ़वी और मौलाना वसी आब्दी ने मीर अनीस की अदबी और दीनी खिदमात पर रोशनी डाली।

पूर्व डिप्टी एसपी वकार हुसैन साहब की मौजूदगी ने कार्यक्रम को विशेष एहतिराम बख्शा।

केपी खान, अर्शी भाई, रफीक भाई, रेहान, आशु भाई और शकील भाई ने भी शिरकत की।

कार्यक्रम के संयोजक शाहकार जैदी साहब के साथ मोहम्मद भाई, अहमद भाई, नफीस भाई और अब्बास निगार साहब ने इंतज़ामात की जिम्मेदारी निभाई और इस कारवां को खूबसूरती से अंजाम तक पहुंचाया।

याद से अमल तक — तहरीक का पैग़ाम

तहरीक-ए-नूर-ए-अमल का मक़सद सिर्फ़ मज़ारों पर हाज़िरी देना नहीं, बल्कि:

  • नेक बुज़ुर्ग मरहूमीन की खिदमात को उजागर करना
  • इसाले सवाब की सामूहिक परंपरा को मजबूत करना
  • कब्रिस्तानों की सफाई और रोशनी का अभियान चलाना
  • नई पीढ़ी को अपनी रूहानी विरासत से जोड़ना

शाहकार जैदी ने कहा,
“अगर याद अमल में न ढले तो वह अधूरी है। हमें अपनी तहज़ीब को सिर्फ़ पढ़ना नहीं, उसे अपने किरदार में उतारना है।”

एक सुबह… जो दिलों में उतर गई

मज़ार के साए में बैठी वह महफिल सिर्फ़ एक शायर की याद नहीं थी—वह लखनऊ की तहज़ीब की जीवित तस्वीर थी।

डेढ़ सदी बीत गई, मगर मीर अनीस का कलाम आज भी जिंदा है।

शायर जिस्म से चला जाता है,
मगर अगर उसका कलाम हुसैन (अ.स.) की मोहब्बत में डूबा हो—
तो वह सदियों तक जिंदा रहता है।

27 शाबान की वह सुबह गवाह बन गई कि
तहरीक-ए-नूर-ए-अमल सिर्फ़ एक मुहिम नहीं—
बल्कि वह रौशनी है
जो कब्रों को भी जगमगाएगी
और दिलों को भी।

और शायद…
उस सुबह मीर अनीस की रूह सचमुच सुकून में थी।

Share This Article
By Tahalka Today Tahalka Today World News Channel
Follow:
Tahalka Today – World News Channel is an independent global journalism platform dedicated to connecting hearts, promoting peace, and presenting truth beyond borders, while upholding the universal belief in the Oneness of the Creator of the entire universe—a principle that stands for equality, moral responsibility, and justice for all humanity. At its core, Tahalka Today believes that lasting global peace cannot be achieved through power alone, but through the recognition of shared human values, ethical accountability, and spiritual consciousness. Our journalism treats information not merely as news, but as a means of understanding, dialogue, and coexistence. In a world increasingly dominated by conflict-driven narratives, propaganda, and polarized media, Tahalka Today offers balanced, research-based, and human-centric reporting on global geopolitics, diplomacy, war and peace, energy security, sanctions, human rights, and international power structures. We go beyond headlines to analyze the political, strategic, and humanitarian consequences of global events—ensuring that truth is delivered with context, clarity, and responsibility. We believe the role of media is not to inflame divisions, but to amplify justice, encourage dialogue, and keep hope alive. Rooted in this philosophy, Tahalka Today also gives voice to the global aspiration for a future defined by universal justice and lasting peace—a hope symbolized across cultures and traditions by the awaited era of moral leadership, fairness, and the end of oppression. The World News Service operates under the close editorial supervision of Syed Rizwan Mustafa, whose sharp global outlook ensures editorial independence, ethical clarity, and peace-oriented journalism. His vision positions Tahalka Today not merely as a media outlet, but as a responsible global narrative platform. With a growing international readership and a strong South Asian perspective, Tahalka Today seeks collaboration with global media organizations, think tanks, peace institutions, and policy platforms to strengthen truth-driven, justice-centered, and peace-focused global journalism. Tahalka Today – Where Truth, Divine Oneness, and Journalism for Peace Connect the World.
Leave a comment

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *