रिपोर्ट: सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
लखनऊ। कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहां इंसान अपने कदमों से नहीं, अपने दिल से चलता है।
मंगल की दोपहर जब मैं लाल बारादरी स्थित राज्य ललित कला अकादमी पहुंचा तो ‘18वीं अन्तर्राष्ट्रीय मोहर्रम फोटोग्राफी, चित्रकला एवं खत्ताती प्रदर्शनी’ का आख़िरी दिन था। समापन का समय करीब था। हॉल में भीड़ नहीं थी, शोर नहीं था, कोई मंचीय भाषण नहीं था। सिर्फ़ खामोशी थी…
मगर वह खामोशी भी बोल रही थी।
ऐसा लग रहा था जैसे दीवारों पर टंगी हर तस्वीर, हर कैनवास, हर खत्ताती अपने भीतर कर्बला की एक दास्तान समेटे हुए है।
मैं एक-एक तस्वीर के सामने रुकता गया…
कहीं छह महीने के अली असगर की प्यास थी…
कहीं अब्बास के कटे हुए बाजुओं की वफ़ा थी…
कहीं ज़ैनब के सब्र की बुलंदी थी…
और कहीं हुसैन की वह शहादत थी जिसने इंसानियत को ज़ुल्म के सामने झुकने से हमेशा के लिए इंकार करना सिखा दिया।
कई बार आंखें धुंधली हो गईं। तस्वीरें दिखाई देना बंद हो गईं। शायद तस्वीरें नहीं, आंखों में उतरते आंसू थे।
दिल में सिर्फ़ एक ही जुमला उठ रहा था—
“या हुसैन…”
और ज़ुबान पर उन कलाकारों के लिए दुआ थी जिन्होंने अपने रंगों, अपने कैमरों और अपनी कलम से अकीदत के ऐसे फूल सजाए जिनकी खुशबू सीधे दिल तक पहुंचती है।
आज पर्दा गिर गया, मगर एहसास बाकी रहेगा
आज इस प्रदर्शनी का समापन हो गया।
दीवारों से तस्वीरें उतर जाएंगी।
खत्तातियों को समेट लिया जाएगा।
पेंटिंग्स अपने-अपने शहरों और देशों को लौट जाएंगी।
लाल बारादरी फिर सामान्य दिनों की तरह खामोश हो जाएगी।
मगर एक कसक दिल में रह गई—
अब यह मंजर पूरे एक साल बाद देखने को मिलेगा।
कौन जाने अगली मोहर्रम प्रदर्शनी तक कौन इस दुनिया में रहे और कौन न रहे।
कौन जाने अगले साल फिर इन तस्वीरों के सामने खड़े होकर “या हुसैन” कहने की तौफीक किसे मिले और किसे न मिले।
ज़िन्दगी की यही सच्चाई शायद कर्बला भी सिखाती है कि इंसान फानी है, लेकिन सच, वफ़ा और हुसैन का पैग़ाम हमेशा बाक़ी रहता है।
हुसैन मज़हब नहीं, इंसानियत हैं
इस प्रदर्शनी की सबसे खूबसूरत बात यह थी कि इसमें शिया कलाकारों से कहीं ज़्यादा सुन्नी और हिन्दू कलाकारों की भागीदारी दिखाई दी।
यह नज़ारा अपने आप में एक पैग़ाम था।
कर्बला किसी एक फ़िरके या मज़हब की जागीर नहीं।
हुसैन इंसाफ़ का नाम हैं।
हुसैन मज़लूमों की आवाज़ हैं।
हुसैन हर उस इंसान के दिल में बसते हैं जो ज़ुल्म के खिलाफ खड़ा होने का हौसला रखता है।
शायद इसी लिए अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और देशों के कलाकारों ने अपने रंगों के ज़रिये इमाम हुसैन को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया।
दुनिया भर से पहुंचे अकीदत के फूल
यहां मौजूद करामत गर्ल्स कॉलेज की तबस्सुम फातिमा ने बताया ईरान, इराक, लेबनान, स्पेन, ग्रीस, सऊदी अरब, तुर्की, बोसनिया, यमन और अल्जीरिया सहित दुनिया के कई देशों के कलाकारों ने अपनी कलाकृतियां भेजीं।
भारत के अलग-अलग शहरों से भी कलाकार शामिल हुए।
प्रोग्राम ऑर्गेनाइजर एसएन लाल साहब के मुताबिक़ करीब 350 से अधिक कलाकृतियों में से चुनिंदा तस्वीरें, पेंटिंग्स और खत्तातियां प्रदर्शित की गईं।
मगर सच यह है कि यहां केवल कलाकृतियां नहीं थीं…
यहां मोहब्बत टंगी हुई थी।
यहां वफ़ा टंगी हुई थी।
यहां सब्र टंगा हुआ था।
यहां कर्बला टंगी हुई थी।
जब मैं बाहर निकला…
प्रदर्शनी से बाहर निकलते हुए मैंने आख़िरी बार मुड़कर हॉल को देखा।
दीवारें वही थीं।
तस्वीरें वही थीं।
मगर दिल बदल चुका था।
ऐसा लगा जैसे किसी ने रूह पर दस्तक दी हो।
जैसे किसी ने याद दिलाया हो कि दुनिया की हर चमक एक दिन खत्म हो जाएगी, लेकिन कर्बला की शमा कभी नहीं बुझेगी।
और फिर दिल से एक दुआ निकली—
“मौला! अगर अगली मोहर्रम तक ज़िन्दगी बाकी रहे तो फिर इस अकीदत के गुलशन को देखने की तौफीक अता फ़रमा… और अगर न रहे, तो हमें उन्हीं लोगों में लिख दे जो हुसैन की मोहब्बत के साथ इस दुनिया से रुख़्सत हुए।”
लाल बारादरी में आज प्रदर्शनी का समापन हुआ,
मगर कर्बला की कहानी आज भी जारी है…
और शायद क़यामत तक जारी रहेगी।




