तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
लखनऊ ,8 मोहर्रम…यह सिर्फ़ तारीख़ नहीं है।
यह वह दिन है जब कर्बला की तपती रेत पर वफ़ा का सबसे बुलंद परचम दिखाई देता है।
यह वह दिन है जब दुनिया को याद आता है कि एक भाई अपने भाई के बच्चों के लिए पानी लाने निकला था।
यह वह दिन है जब हज़रत अब्बास अलमदार (अ.) का नाम लेते ही इंसानियत की आँखें नम हो जाती हैं।
और शायद यही वजह है कि लाल बारादरी में प्रदर्शित तबस्सुम फ़ातिमा की पेंटिंग “सब्र-ओ-इस्तेक़ामत: कर्बला से होर्मुज़ तक” आज 8 मोहर्रम के दिन एक नया अर्थ ले लेती है।
यह सिर्फ़ एक पेंटिंग नहीं रहती, बल्कि कर्बला की प्यास, अब्बास की वफ़ा और इतिहास के न्याय की एक ख़ामोश तफ़्सीर बन जाती है।
एक तरफ़ फ़ुरात… दूसरी तरफ़ होर्मुज़
कभी कर्बला में फ़ुरात बह रही थी।
पानी सामने था।
लहरें सामने थीं।
लेकिन हक़ वालों के लिए रास्ता बंद था।
मासूम अली असग़र की प्यास से लेकर सकीना की सूखी हुई ज़ुबान तक, हर तरफ़ पानी का ज़िक्र था लेकिन पानी नसीब नहीं था।
तब एक शख़्स उठा।
जिसे दुनिया आज सक़्क़ा-ए-कर्बला कहती है।
जिसका नाम अब्बास था।
जिसकी पहचान वफ़ा थी।
जो फ़ुरात तक पहुँचा।
जिसने चुल्लू में पानी लिया।
लेकिन पिया नहीं।
क्योंकि उसे अपने होंठों से ज़्यादा हुसैन (अ.) के बच्चों की प्यास याद थी।
इतिहास में शायद इससे बड़ा सब्र और इससे बड़ी वफ़ादारी कोई मिसाल नहीं मिलती।
एक चुल्लू पानी और पूरी इंसानियत का इम्तिहान
तबस्सुम फ़ातिमा की पेंटिंग के बीचों-बीच दिखाई देने वाली वह बूंद सिर्फ़ पानी नहीं है।
वह उसी चुल्लू का पानी है जिसे अब्बास (अ.) ने अपने होंठों तक ले जाकर वापस फ़ुरात में गिरा दिया था।
वह बूंद कहती है—
“जिसे अपने लिए नहीं पिया गया, उसे इतिहास ने अमर कर दिया।”
आज भी जब कोई उस बूंद को देखता है तो उसे सिर्फ़ पानी नहीं दिखाई देता।
उसे सब्र दिखाई देता है।
उसे कुर्बानी दिखाई देती है।
उसे वफ़ा दिखाई देती है।
एक लकीर जो तलवार से नहीं, इरादे से खींची गई
कर्बला में यज़ीद की फ़ौज ने फ़ुरात के किनारे पहरा बैठा दिया था।
यह पानी तुम्हारे लिए नहीं।
यह दरिया तुम्हारे लिए नहीं।
यह ज़िंदगी तुम्हारे लिए नहीं।
लेकिन इतिहास की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि ज़ालिमों का पहरा हमेशा मिट जाता हैं।
और मज़लूमों की कुर्बानियाँ हमेशा ज़िंदा रहती हैं।
1400 साल बाद दुनिया ने देखा कि जिस मज़लूमी को कुचलने की कोशिश की गई थी, उसी की याद दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों तक पहुँच गई।
आज जब होर्मुज़ का नाम आता है तो दुनिया की बड़ी-बड़ी ताक़तें बेचैन हो जाती हैं।
तेल की कीमतें बढ़ती हैं।
बाज़ार काँपते हैं।
सरकारें चिंतित हो जाती हैं।
दुनिया समझ जाती है कि पानी, समंदर और रास्तों की अहमियत क्या होती है।
कर्बला की प्यास आज भी दुनिया को समझा रही है
कर्बला का संदेश सिर्फ़ मज़हबी नहीं, इंसानी है।
जब किसी बच्चे को पानी से रोका जाता है, कर्बला याद आती है।
जब किसी मज़लूम पर ज़ुल्म होता है, कर्बला याद आती है।
जब कोई अपने हिस्से की खुशी छोड़कर दूसरों को प्राथमिकता देता है, अब्बास याद आते हैं।
जब कोई सब्र करता है, हुसैन याद आते हैं।
और जब कोई यह समझता है कि ताक़त हमेशा हथियारों से नहीं, बल्कि सिद्धांतों से पैदा होती है, तब कर्बला का असली मतलब समझ में आता है।
तबस्सुम फ़ातिमा की पेंटिंग का सबसे बड़ा सवाल
इस पेंटिंग में कोई चेहरा नहीं।
कोई फ़ौज नहीं।
कोई तलवार नहीं।
कोई युद्ध नहीं।
लेकिन फिर भी पूरा कर्बला मौजूद है।
क्योंकि कर्बला इमारतों, घोड़ों और हथियारों का नाम नहीं।
कर्बला एक विचार का नाम है।
एक प्रतिरोध का नाम है।
एक ऐसे सब्र का नाम है जो समय को हरा देता है।
आज 8 मोहर्रम पर…
जब अलम-ए-अब्बास उठते हैं…
जब “या अब्बास” की सदाएँ बुलंद होती हैं…
जब सैकड़ों साल पुराना दर्द फिर ताज़ा होता है…
तो तबस्सुम फ़ातिमा की यह पेंटिंग मानो ख़ामोशी से एक बात कहती है
“जिस दिन फ़ुरात का पानी रोका गया था, उस दिन दुनिया ने ज़ुल्म की ताक़त देखी थी।
लेकिन जिस दिन अब्बास ने चुल्लू भर पानी को अपने होंठों पर हराम कर लिया, उस दिन दुनिया ने इंसानियत की सबसे बड़ी जीत देखी थी।”
और शायद इसलिए 1400 साल बाद भी…
फ़ुरात की प्यास खत्म नहीं हुई है।
वह हर मोहर्रम में आँखों से बहती है।
वह हर अलम के साथ चलती है।
वह हर “या अब्बास” के नारे में सुनाई देती है।
और वह तब तक ज़िंदा रहेगी…
जब तक दुनिया में वफ़ा, सब्र और इंसाफ़ का नाम लिया जाता रहेगा।
तबस्सुम फातिमा कौन है
इमाम खुमैनी के किन्तूर की हक परस्त जमीन से उपजे जस्टिस करामत हुसैन के कालेज लखनऊ की टीचर है
तबस्सुम फ़ातिमा पिछले 17 वर्षों से मुहर्रम प्रदर्शनी का हिस्सा हैं।
जब वन वॉइस ट्रस्ट के चेयरमैन एस.एन. लाल ने 18 वर्ष पहले इस प्रदर्शनी की नींव रखी थी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक कलाकार अपने रंगों के ज़रिये इतने लंबे समय तक इमाम हुसैन (अ.) के पैग़ाम को जीवित रखने की कोशिश करती रहेगी।
उनकी इसी ख़िदमत को देखते हुए उन्हें “पैग़ाम-ए-इमाम हुसैन अवॉर्ड”, “निशान-ए-उर्दू अवॉर्ड” और “अवध गौरव सम्मान” जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है।
लाल बारादरी की दीवार पर टंगी ये पेंटिंग सिर्फ़ एक कलाकृति नहीं लगती।
वह कर्बला की प्यास का आँसू है।
वह सब्र की तस्बीह का मोती है।
वह इतिहास के माथे पर चमकता हुआ एक सच है।
और उसकी वह अकेली बूंद जैसे पूरी इंसानियत से कह रही हो—
“जिस दिन फ़रात का पानी रोका गया था, उस दिन दुनिया ने ज़ुल्म देखा था।
और जिस दिन वही प्यास होर्मुज़ के समंदर में बदल गई, उस दिन दुनिया ने सब्र की ताक़त देखी।”




