तहलका टुडे ब्यूरो | लखनऊ
उत्तर प्रदेश वक्फ न्यायाधिकरण द्वारा उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) जीशान रिज़वी को न्यायाधिकरण के अंतरिम आदेश की अवहेलना का दोषी मानते हुए एक माह के सिविल कारावास का आदेश पारित किए जाने के बाद शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड में प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। मोहर्रम की छुट्टियों के बाद जब बोर्ड का कार्यालय खुला तो पूरे दिन अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच न्यायाधिकरण के आदेश, संभावित कानूनी विकल्पों और आगे की प्रशासनिक स्थिति को लेकर चर्चाओं का दौर चलता रहा।
सूत्रों के अनुसार, सीईओ जीशान रिज़वी अपने कार्यालय पहुंचे, लेकिन पूरे दिन किसी महत्वपूर्ण पत्रावली पर प्रशासनिक नोटिंग अथवा अंतिम निर्णय दर्ज करने से परहेज़ करते रहे। हालांकि, इस संबंध में बोर्ड की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।
सूत्रों का दावा— हसन रज़ा के साथ हुई रणनीतिक बैठक
बोर्ड से जुड़े सूत्रों का दावा है कि सेवानिवृत्ति के बाद सेवा विस्तार प्राप्त कर चुके तथा पूर्व में चार्जशीट का सामना कर चुके प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा के साथ आंतरिक स्तर पर एक बैठक हुई। सूत्रों के अनुसार, बैठक में न्यायाधिकरण के आदेश के कानूनी प्रभावों पर चर्चा की गई और अधिकारियों को सलाह दी गई कि जब तक स्थिति स्पष्ट न हो जाए, तब तक किसी भी महत्वपूर्ण पत्रावली पर हस्ताक्षर या निर्णायक प्रशासनिक आदेश जारी करने से बचा जाए।

हाईकोर्ट में अपील की तैयारी, विपक्ष ने पहले ही दाखिल की कैविएट
सूत्रों के अनुसार, न्यायाधिकरण के आदेश के विरुद्ध इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में अपील दाखिल करने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है। बताया जा रहा है कि अपील संबंधी औपचारिकताओं के लिए आवश्यक दस्तावेज और फोटोग्राफ तैयार कराए गए हैं।
इसी बीच, मामले में वादी पक्ष ने संभावित अपील को देखते हुए हाईकोर्ट में कैविएट भी दाखिल कर दी है। यदि अपील प्रस्तुत की जाती है, तो कैविएट के कारण न्यायालय सामान्यतः संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिए बिना कोई एकपक्षीय अंतरिम आदेश पारित नहीं करता।
अल्पसंख्यक कल्याण एवं ग्राम्य विकास विभाग तक पहुंचा आदेश
जानकारी के अनुसार, वक्फ न्यायाधिकरण का आदेश उत्तर प्रदेश शासन के अल्पसंख्यक कल्याण एवं मुस्लिम वक्फ विभाग तथा ग्राम्य विकास विभाग को भी भेजा जा चुका है।
यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सीईओ जीशान रिज़वी मूलतः ग्राम्य विकास विभाग के अधिकारी हैं और प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड में मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। ऐसे में न्यायाधिकरण के आदेश के बाद उनकी सेवा स्थिति, प्रतिनियुक्ति और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर भी प्रशासनिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।
क्या है पूरा मामला?
पूरा विवाद लखनऊ के ऐतिहासिक वक्फ इमामबाड़ा आगा बाकर (पंजीयन संख्या-I-1532) के प्रबंधन से जुड़ा है।
पूर्व मुतवल्लिया किश्वर जहां के निधन के बाद प्रबंधन को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। 26 जून 2025 को उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से एक आदेश जारी कर प्रबंधन समिति और अफसर मिर्ज़ा को संयुक्त रूप से मोहर्रम संबंधी कार्यों के संचालन का अधिकार दिया गया था।
इस आदेश को चुनौती देते हुए वक्फ न्यायाधिकरण में वाद दायर किया गया, जिस पर 21 अगस्त 2025 को न्यायाधिकरण ने उक्त आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी।
न्यायाधिकरण के अनुसार, इसके बावजूद 11 सितम्बर 2025 को एक नया पत्र जारी किया गया, जिसके माध्यम से पहले से स्थगित व्यवस्था को व्यवहार में लागू करने का प्रयास किया गया। न्यायाधिकरण ने इसे अपने अंतरिम आदेश का उल्लंघन माना।
ट्रिब्यूनल की सख्त टिप्पणी
तीन सदस्यीय पीठ ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा कि 11 सितम्बर 2025 का पत्र केवल स्पष्टीकरण मांगने के लिए नहीं था, बल्कि उसकी भाषा से स्पष्ट था कि पहले से स्थगित आदेश को प्रभावी बनाने की कोशिश की जा रही थी।
न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि यदि बोर्ड को प्रबंधन समिति के विरुद्ध शिकायतें थीं तो उनके निस्तारण के लिए अलग वैधानिक प्रक्रिया उपलब्ध थी, लेकिन न्यायालय द्वारा स्थगित आदेश को पुनः लागू नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर आदेश 39 नियम 2-ए, सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत सीईओ जीशान रिज़वी और अफसर मिर्ज़ा को एक माह के सिविल कारावास का आदेश पारित किया गया।
प्रशासनिक और कानूनी हलकों में चर्चा
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि न्यायाधिकरण का आदेश प्रभावी है और उसके विरुद्ध किसी सक्षम न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त नहीं हुआ है, तो आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया संबंधित सक्षम प्राधिकारियों द्वारा लागू विधिक प्रावधानों और सेवा नियमों के अनुसार तय की जाएगी।
इसी कारण शासन स्तर पर भी इस प्रकरण को गंभीरता से देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, संबंधित विभागों को न्यायाधिकरण के आदेश की प्रतियां उपलब्ध कराई जा चुकी हैं।
सबकी निगाहें हाईकोर्ट और शासन पर
अब पूरे मामले में सबकी निगाहें दो महत्वपूर्ण बिंदुओं पर टिकी हैं—पहला, क्या हाईकोर्ट से इस आदेश पर कोई अंतरिम राहत मिलती है; और दूसरा, क्या उत्तर प्रदेश शासन के संबंधित विभाग प्रतिनियुक्त अधिकारी की सेवा स्थिति तथा न्यायाधिकरण के आदेश के अनुपालन के संबंध में कोई प्रशासनिक निर्णय लेते हैं।
फिलहाल उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड, सीईओ जीशान रिज़वी तथा संबंधित विभागों की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। ऐसे में आने वाले दिनों में न्यायालय और शासन—दोनों स्तरों पर होने वाली कार्रवाई इस प्रकरण की दिशा तय करेगी।




