तहलका टुडे टीम/हसनैन मुस्तफा
नजफ़ अशरफ़/लखनऊ।
धरती, पर्यावरण और इंसानी ज़िंदगी की हिफ़ाज़त को इस्लाम की बुनियादी ज़िम्मेदारियों में शामिल करते हुए मरजा-ए-आला आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली हुसैनी सीस्तानी (दाम ज़िल्लुहुल आली) के दफ़्तर, नजफ़ अशरफ़ (इराक़) ने एक अहम शरई बयान जारी किया है। इस बयान में साफ़ तौर पर कहा गया है कि बिना ट्रीटमेंट (शोधन) का सीवेज, ठोस कचरा, मेडिकल वेस्ट और रासायनिक अपशिष्टों को नदियों में डालना शरई तौर पर हराम है, क्योंकि इससे इंसानों, पर्यावरण और समूचे समाज को गंभीर नुकसान पहुँचता है।
यह मार्गदर्शन इराक़ की नदियों में बढ़ते प्रदूषण के संबंध में पूछे गए एक इस्तिफ़्ता (धार्मिक प्रश्न) के उत्तर में जारी किया गया है, लेकिन इसका संदेश पूरी दुनिया के लिए है। भारत में गंगा, यमुना, गोमती, घाघरा, सरयू, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी सहित सभी नदियों की पवित्रता और स्वच्छता की रक्षा के लिए भी यह फ़तवा एक महत्वपूर्ण नैतिक और धार्मिक संदेश माना जा रहा है।
क्या पूछा गया था?
मोमिनीन की ओर से मरजइयत के दफ़्तर को भेजे गए प्रश्न में कहा गया कि इराक़ में कुछ लोग बिना शोधन का गंदा सीवेज, ठोस कचरा, मेडिकल वेस्ट तथा विभिन्न प्रकार के रासायनिक अपशिष्ट सीधे नदियों में फेंक रहे हैं। इससे जल स्रोत गंभीर रूप से प्रदूषित हो रहे हैं और पर्यावरण के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य पर भी अत्यंत नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इस विषय पर शरई मार्गदर्शन की प्रार्थना की गई।
मरजा-ए-आला का स्पष्ट उत्तर
मरजइयत की ओर से जारी उत्तर में कहा गया है:
बिना ट्रीटमेंट का सीवेज, ठोस कचरा, मेडिकल वेस्ट और रासायनिक अपशिष्टों को नदियों में डालना जायज़ नहीं है। चूँकि इससे आम जनता को नुकसान पहुँचता है, इसलिए ऐसा करना शरई तौर पर हराम है।
बयान में यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि किसी व्यक्ति के इस कार्य से लोगों को हानि पहुँचती है, तो कुछ परिस्थितियों में उस नुकसान की ज़िम्मेदारी भी उसी पर होगी।
कानून का पालन भी शरई ज़िम्मेदारी
दफ़्तर-ए-मरजइयत ने अपने बयान में यह भी कहा कि संबंधित सरकारी संस्थाओं द्वारा बनाए गए पर्यावरण संरक्षण संबंधी कानूनों और निर्देशों का उल्लंघन करना भी जायज़ नहीं है।
साथ ही सरकारों और संबंधित विभागों को यह ज़िम्मेदारी निभाने की भी ताकीद की गई कि वे सीवेज, मेडिकल वेस्ट और अन्य हानिकारक अपशिष्टों के सुरक्षित निस्तारण के लिए उचित और वैकल्पिक व्यवस्थाएँ उपलब्ध कराएँ।
पर्यावरण की रक्षा सामूहिक ज़िम्मेदारी
मरजा-ए-आला ने आम जनता से अपील की कि वे बुद्धिमत्ता, ज़िम्मेदारी और सामाजिक हित को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाएँ। नदियों की स्वच्छता केवल सरकारी विभागों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा ज़िम्मेदारी है।
भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश
भारत की अनेक नदियाँ आज औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज और प्लास्टिक प्रदूषण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे समय में आयतुल्लाहिल उज़्मा सीस्तानी द०ज़ि० का यह शरई मार्गदर्शन केवल इराक़ तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। यह बताता है कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा इबादत का हिस्सा है और उन्हें प्रदूषित करना इंसानियत तथा शरियत—दोनों के ख़िलाफ़ है।
यह शरई उत्तर 15 मुहर्रमुल हराम 1448 हिजरी को जारी किया गया। इसका हिंदी अनुवाद शोबा-ए-इस्तिफ़्ताआत, दफ़्तर-ए-नुमाइंदगी आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली हुसैनी सीस्तानी द०ज़ि०, बाबुन्नजफ़, लखनऊ द्वारा प्रकाशित किया गया।




