तहलका टुडे टीम | सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
नई दिल्ली/तेहरान।
इतिहास में कुछ पल ऐसे होते हैं जो केवल कैलेंडर की तारीख़ नहीं रहते, बल्कि पूरी इंसानियत की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं। गुरुवार की शाम नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ऐसा ही एक ऐतिहासिक और भावुक दृश्य देखने को मिला, जब भारत की सुप्रीम रिलीजियस अथॉरिटी आफ़ताब-ए-शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी के नेतृत्व में 300 से अधिक भारतीय ज़ायरीन, उलेमा, बुद्धिजीवी और गणमान्य नागरिकों का विशाल प्रतिनिधिमंडल रहबर-ए-मोअज़्ज़म आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई की तदफ़ीन और अंतिम श्रद्धांजलि में शिरकत करने के लिए इस्लामी गणराज्य ईरान रवाना हुआ।
सूत्रों के अनुसार ईरान की प्रतिष्ठित एयरलाइन Mahan Air का विशेष Airbus A340 विमान, जिसकी क्षमता 300 से अधिक यात्रियों की है, विशेष रूप से इस भारतीय प्रतिनिधिमंडल को लेकर जाने के लिए नई दिल्ली पहुँचा। यह विशेष विमान शाम लगभग 7:30 बजे सीधे तेहरान के लिए रवाना हुआ। बताया जाता है कि इस उड़ान के संचालन के लिए निर्धारित समय पर आवश्यक एयरस्पेस की विशेष व्यवस्था भी की गई, ताकि विभिन्न देशों से आने वाले प्रतिनिधिमंडल समय पर ईरान पहुँच सकें।
जब दिल्ली एयरपोर्ट दुआओं से गूंज उठा…
दिल्ली एयरपोर्ट पर विदाई का दृश्य अत्यंत मार्मिक था। ज़ायरीन की आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरों पर अपने रहबर को अंतिम सलाम पेश करने का सुकून और गर्व भी साफ़ दिखाई दे रहा था। हर ओर दुरूद, दुआ और इस्तिग़फ़ार की सदाएँ गूँज रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा भारत अपनी मोहब्बत, अकीदत और सम्मान इस प्रतिनिधिमंडल के माध्यम से तेहरान भेज रहा हो।
मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी के नेतृत्व में रवाना हुआ यह प्रतिनिधिमंडल केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भारत के करोड़ों अकीदतमंदों की भावनाओं, आध्यात्मिक जुड़ाव और रहबर-ए-मोअज़्ज़म के प्रति अटूट सम्मान का प्रतीक बन गया। सूत्रों के अनुसार यह भारत से पहली सीधी विशेष उड़ान थी और आने वाले दिनों में ऐसी कई अन्य विशेष उड़ानों के संचालन की भी संभावना है।
राष्ट्रीय एकता और धार्मिक सौहार्द का अद्भुत दृश्य
भारतीय प्रतिनिधिमंडल को विदा करने के लिए दिल्ली एयरपोर्ट पर धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और कूटनीतिक जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियाँ उपस्थित रहीं। इनमें भारत में इस्लामी गणराज्य ईरान के राजदूत डॉ. फ़तेह अली, रहबर-ए-मोअज़्ज़म के भारत में प्रतिनिधि हकीम अब्दुल माजिद इलाही, दिल्ली के इमाम-ए-जुमा मौलाना सैयद तकी मोहसिन, सुशील गोस्वामी, सरदार परमजीत सिंह चंडोक, स्वामी सारंग, मौलाना यासूब अब्बास, मौलाना तकी नक़वी, पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती, पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद सहित अनेक प्रमुख उलेमा, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
राजनीतिक दलों की ओर से भी उल्लेखनीय सहभागिता देखने को मिली। समाजवादी पार्टी की ओर से मोहम्मद एबाद ने उपस्थित होकर रहबर-ए-मोअज़्ज़म के प्रति अकीदत के साथ रवाना हुए।
पूरी दुनिया की निगाहें तेहरान पर
रहबर-ए-मोअज़्ज़म के अंतिम दीदार, नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन में भाग लेने के लिए दुनिया भर से राष्ट्राध्यक्ष, मंत्री, सांसद, धार्मिक नेता, उलेमा, बुद्धिजीवी और लाखों श्रद्धालु ईरान पहुँच रहे हैं। यह उन दुर्लभ ऐतिहासिक अवसरों में से एक है जब पूरी दुनिया की निगाहें एक साथ तेहरान पर केंद्रित हैं।
भारत का यह प्रतिनिधिमंडल भी देश की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करेगा और वैश्विक धार्मिक एकजुटता, शांति, इंसानियत तथा भाईचारे का संदेश देगा।
4 से 9 जुलाई तक चलेगा श्रद्धांजलि कार्यक्रम
◾ 4–5 जुलाई | तेहरान: अंतिम दीदार के लिए आम जनता को अवसर, लाखों लोगों की सहभागिता की संभावना।
◾ 6 जुलाई | तेहरान: ऐतिहासिक नमाज़-ए-जनाज़ा, जनाज़ा जुलूस और तदफ़ीन का मुख्य कार्यक्रम।
◾ 7 जुलाई | क़ुम: हौज़ा-ए-इल्मिया, मराजे-ए-किराम और उलेमा की मौजूदगी में विशेष श्रद्धांजलि सभाएँ।
◾ 9 जुलाई | मशहद: इमाम रज़ा (अ.) के हरम के आगोश में तदफीन विशेष मजलिस, कुरआनख़्वानी, फ़ातेहाख़्वानी और दुआ।
36 वर्षों का नेतृत्व, इतिहास की अमिट विरासत
आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई ने लगभग 36 वर्षों तक ईरान का नेतृत्व किया। इस अवधि में ईरान ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, क्षेत्रीय संघर्षों और अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ किया। उनके समर्थकों की दृष्टि में वे केवल ईरान के सर्वोच्च नेता नहीं, बल्कि प्रतिरोध, आत्मसम्मान, वैचारिक दृढ़ता और उत्पीड़ितों की आवाज़ के प्रतीक रहे।
एक युग को विदाई… इतिहास का नया अध्याय
यह केवल एक महान धार्मिक और राजनीतिक व्यक्तित्व को विदाई देने का अवसर नहीं, बल्कि उस युग को अंतिम सलाम है जिसने करोड़ों लोगों के विचार, संघर्ष, आस्था और आत्मविश्वास को नई दिशा दी।
भारत से रवाना हुआ यह प्रतिनिधिमंडल अपने साथ केवल यात्रियों को नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की मोहब्बत, दुआएँ, सम्मान और अंतिम सलाम लेकर तेहरान पहुँचेगा। इतिहास इस यात्रा को भारत और ईरान के बीच आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और मानवीय रिश्तों के सबसे भावनात्मक और ऐतिहासिक अध्यायों में से एक के रूप में याद रखेगा।




