वफ़ा की कीमत, बाराबंकी की मिट्टी की एक दास्तान

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फ़ैज़ी रिज़वी

बाराबंकी की मिट्टी बड़ी अजीब है। यह खेतों में अन्न ही नहीं उगाती, बल्कि कभी-कभी ऐसे इंसान भी जन्म देती है जिनकी पहचान उनके घर, दौलत या ओहदे से नहीं, बल्कि उनके किरदार से होती है। इसी मिट्टी ने ऐसे लोग भी देखे हैं जो हक़ की राह में अपनी जान तक कुर्बान करने को तैयार रहे, और ऐसे चेहरे भी देखे हैं जो कुर्सी की चमक में अपने ज़मीर की आवाज़ खो बैठे।

वक़्त का अपना एक इंसाफ़ होता है। अदालतें मुक़दमे निपटाती हैं, मगर इतिहास केवल किरदारों का फैसला लिखता है।

यह सन 1997 की बात है।

उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी। पूरे प्रदेश में आज़ादारी को लेकर तनाव का माहौल था। फिर वह सुबह आई जिसने लाखों दिलों को बेचैन कर दिया।

28 जून 1997 की भोर, मायावती सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत आफ़ताब-ए-शरीअत मौलाना कल्बे जवाद नक़वी साहब को गिरफ़्तार कर ललितपुर जेल भेज दिया।

यह केवल एक गिरफ़्तारी नहीं थी; यह लाखों अकीदतमंदों की भावनाओं पर चोट थी।

ख़बर जंगल की आग की तरह फैली। लखनऊ से लेकर बाराबंकी और प्रदेश के अनेक शहरों में बेचैनी फैल गई। लोग घरों से निकल पड़े। विरोध की आवाज़ें उठने लगीं। लेकिन हर भीड़ में कोई ऐसा होता है जो केवल नारे नहीं लगाता, बल्कि अपने अस्तित्व को दाँव पर लगा देता है।

तभी बाराबंकी की गलियों से एक आवाज़ गरजी।

उस आवाज़ का नाम था सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा

उन्होंने घोषणा कर दी—

“यदि मौलाना कल्बे जवाद नक़वी साहब को रिहा नहीं किया गया, तो मैं उत्तर प्रदेश विधानसभा के सामने आत्मदाह करूँगा।”

यह कोई राजनीतिक बयान नहीं था।

यह एक ऐसे इंसान की पुकार थी, जिसने अपने रहबर की तौहीन को अपनी ज़िंदगी से बड़ा नहीं समझा।

आत्मदाह…

यह शब्द पूरे उत्तर प्रदेश में बिजली की तरह दौड़ गया।

बाराबंकी से लोग लखनऊ पहुँचे। हज़रतगंज की सड़कें गवाह बनीं कि एक साधारण मियाँ-बीवी रिक्शे से उतरकर “या हुसैन” की सदाओं के साथ डीएम आवास पर मातम करने लगे। उनकी आँखों में आँसू थे, मगर दिलों में ख़ौफ़ नहीं था। गिरफ्तार हुए।

पत्रकारिता के साथ रिज़वान मुस्तफा छात्र राजनीति में भी एक्टिव थे,उसका असर ये रहा कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के छात्र भी सड़कों पर उतर आए। देखते ही देखते आंदोलन प्रदेशव्यापी हो गया। अख़बारों के पहले पन्ने इसी ख़बर से भर गए। हर दिन नए प्रदर्शन, हर दिन नई गिरफ़्तारियाँ, हर दिन बढ़ता जनाक्रोश।

सरकार समझ गई कि यह केवल एक धार्मिक नेता की गिरफ़्तारी नहीं रही, बल्कि यह जनता की भावना का प्रश्न बन चुका है।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा को नज़रबंद कर दिया गया।

लेकिन नज़रबंदी शरीर को रोक सकती है, इरादों को नहीं।

लोगो के मुताबिक उधर उसी दौर में कुछ ऐसे लोग भी थे, जो सत्ता के गलियारों की गर्माहट में अपने भविष्य की तलाश कर रहे थे। बसपा सरकार मे मायावती पर अपना जादू चलाने वाले उस वक्त निहाल रिजवी ने उन्होंने मौलाना साहब के विरोध का रास्ता चुना। कई बयान दिए ,लोगो का गुस्सा तो चरम पर था ,उनके वालिद साहब इन की हरकतों से ऐसा नाराज़ हुए कि उनको जैदपुर में बड़ी सरकार के इमामबाड़े में भरे मजमे में लाउडस्पीकर लगाकर आक करने का ऐलान कर दिया।

इतिहास ने उस दिन भी दो रास्ते देखे—एक रास्ता कुर्बानी का था और दूसरा मक्खन बाजी का।

मगर जनता का सब्र आखिर कब तक आज़माया जाता?

हर दिन आंदोलन और तेज़ होता गया। मातमी जुलूस निकले, धरने हुए, प्रदर्शन हुए, अख़बारों की सुर्खियाँ बदलती रहीं और सरकार पर दबाव बढ़ता गया। बाराबंकी में ज़ोरदार प्रदर्शन हुए करबला से कलेक्ट्रेट तक बच्चों बुजुर्गो ,महिलाओं का प्रदर्शन यादगाट बन गया,गांधी वादी पंडित राजनाथ शर्मा जी भी शामिल थे,

आख़िरकार जनआक्रोश के सामने सत्ता को झुकना पड़ा।

8 जुलाई 1997 को आफ़ताब-ए-शरीअत मौलाना कल्बे जवाद नक़वी साहब को बा-इज़्ज़त रिहा कर दिया गया।

रिहाई की ख़बर आई तो जैसे पूरे प्रदेश में ईद उतर आई हो।

लेकिन इस दास्तान का सबसे ख़ूबसूरत अध्याय अभी बाकी था।

जब मौलाना साहब बाराबंकी में इस्तकबाल की तैयारियां हो रही थी। एक और दृश्य इतिहास का हिस्सा बन गया।

तत्कालीन ज़िलाधिकारी ने सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा से पूछा—

“हमारे लिए कोई हुक्म?”

जवाब में अपने कायद के लिए सिर्फ़ इंस्पेक्शन बंगले में ठहरने की व्यवस्था और गार्ड ऑफ ऑनर का अनुरोध किया गया।

आदेश तत्काल जारी हुए।

सफ़ेदाबाद की सड़कें इंसानों के समंदर में बदल गई थीं।

हज़ारों मोटरसाइकिलों का काफ़िला, हाथों में झंडे, आँखों में आँसू, होंठों पर नारे और दिलों में सुकून…

ऐसा लगता था जैसे किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी क़ौम के सम्मान का स्वागत हो रहा हो।

वह इस्तक़बाल किसी नेता का नहीं था।

वह उस हौसले का इस्तक़बाल था जिसने जेल की सलाखों से भी बड़ा अपना यक़ीन साबित किया था। हर धर्म के लोगों ने शहर ने उनका ऐसा इस्तक़बाल किया जिसे आज भी पुराने लोग नम आँखों से याद करते हैं।

इंस्पेक्शन बंगले से सम्मान की सलामी के साथ कारवाँ नगर पालिका सभागार पहुँचा।

वहाँ अदब, इल्म और समाज की नामचीन हस्तियाँ मौजूद थीं।

दुनिया के मशहूर शायर ख़ुमार बाराबंकवी, राजीव राज, हामिद बहराइची, डॉ. रज़ा मौराँवी, चचा अमीर हैदर एडवोकेट, आज़र बाराबंकवी, सैयद शुजाअत हुसैन रिज़वी तथा अनेक सांसद , विधायक, चेयरमैन,जनप्रतिनिधियों ने गर्मजोशी से उनका इस्तक़बाल किया।

वह केवल एक स्वागत समारोह नहीं था।

वह उस विचार का सम्मान था, जो अपने उसूलों के लिए हर कीमत चुकाने का हौसला रखता है।

“आफताब ए शरीयत” का खिताब बाराबंकी के ही मोमिनीन ने इस “जश्न ए सरकार ए दो आलम” में दिया गया था ,

आज लगभग तीन दशक बीत चुके हैं।

सरकारें बदल गईं।

कुर्सियाँ बदल गईं।

चेहरे बदल गए।

लेकिन बाराबंकी की हवा आज भी उन दिनों की कहानी सुनाती है।

वह कहती है कि इंसान की पहचान उसके भाषणों से नहीं होती, बल्कि उस घड़ी से होती है जब उसे अपने ज़मीर और अपने स्वार्थ में से किसी एक को चुनना पड़ता है।

वक़्त की धूल बहुत कुछ ढँक देती है, मगर कुर्बानी के निशान कभी नहीं मिटते।

कुर्सियाँ इतिहास के पन्नों में गुम हो जाती हैं, मगर वफ़ा हमेशा लोगों के दिलों में ज़िंदा रहती है।

और शायद इसी कारण बाराबंकी की मिट्टी आज भी उन क़दमों की आहट पहचानती है, जिन्होंने सत्ता के दरवाज़ों पर सिर झुकाने के बजाय हक़ की राह में अपना सिर ऊँचा रखा।

 

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