छह ग्राम से बारह ग्राम तक: जब एक इंजेक्शन ने कुसुमा की कहानी बदल दी

मातृ स्वास्थ्य की मजबूत रीढ़ बन रहा FCM | निदेशक डॉ. पिंकी जोवेल की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में मातृ एनीमिया प्रबंधन को नई दिशा | 10 हजार से अधिक डोज लगाए गए

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लखनऊ, 29 सितंबर 2026 | तहलका टुडे टीम/मासूमा फातिमा

कुसुमा देवी की कहानी किसी सरकारी फाइल में दर्ज एक और आंकड़ा नहीं है।

यह उस मां की कहानी है जिसके लिए गर्भावस्था का आठवां महीना खुशी से ज्यादा चिंता लेकर आया था। रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन था—सिर्फ छह ग्राम प्रति डेसीलीटर।

शरीर जवाब दे रहा था। कमजोरी थी, थकान थी, हाथ-पैरों में झुनझुनी थी। आयरन की गोलियां भी उन्हें अनुकूल नहीं लग रही थीं। पेट में पल रहे बच्चे की चिंता अपनी जगह थी और अपने शरीर की कमजोरी अपनी जगह।

फिर डॉक्टरों ने उन्हें फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज यानी FCM देने की सलाह दी।

करीब एक महीने बाद जब खून की जांच हुई तो रिपोर्ट में संख्या बदल चुकी थी।

छह ग्राम से बारह ग्राम।

और पांच सितंबर को कुसुमा देवी ने सामान्य प्रसव के जरिए 2.8 किलोग्राम वजन के स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।

कुसुमा देवी की यह कहानी अब उत्तर प्रदेश में मातृ एनीमिया से लड़ने की उस बड़ी पहल का हिस्सा बन चुकी है, जिसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के स्तर पर आगे बढ़ाया जा रहा है।

डॉ. पिंकी जोवेल: दवा से आगे, पूरी व्यवस्था को जोड़ने की कोशिश

उत्तर प्रदेश में इस पहल को संस्थागत रूप देने में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक डॉ. पिंकी जोवेल की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

मातृ एनीमिया को केवल आयरन की गोली या इंजेक्शन तक सीमित रखने के बजाय उपचार व्यवस्था को स्क्रीन, रेफर, ट्रैक और ट्रीट मॉडल से जोड़ने की दिशा में काम किया गया है।

यानी महिला की पहचान सिर्फ हो नहीं, बल्कि उसके बाद उसे उचित स्वास्थ्य संस्थान तक पहुंचाया जाए, उपचार मिले और फिर यह भी देखा जाए कि उपचार के बाद उसकी स्थिति कैसी है।

यही वह सोच है जिसने FCM को केवल एक दवा से निकालकर मातृ स्वास्थ्य व्यवस्था की एक कड़ी बनाने की दिशा दी है।

डॉ. पिंकी जोवेल के मुताबिक, गर्भवती महिलाओं में एनीमिया के उपचार के लिए आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हर महिला एक जैसी परिस्थितियों में नहीं होती। कुछ महिलाओं को गोलियां नियमित लेने में कठिनाई होती है, कुछ में दुष्प्रभाव सामने आते हैं और कुछ मामलों में गर्भावस्था के दौरान तेजी से आयरन की कमी पूरी करने की जरूरत होती है।

ऐसे मामलों में FCM एक विकल्प के रूप में सामने आया है।

एक इंजेक्शन, कम चक्कर—लेकिन मकसद इलाज को आसान बनाना

आयरन सुक्रोज जैसी अंतःशिरा आयरन व्यवस्था में कई बार स्वास्थ्य संस्थान आने की जरूरत पड़ सकती है।

FCM अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में आयरन एक ही उपचार सत्र में देने की सुविधा प्रदान करता है। इससे उपयुक्त महिलाओं में बार-बार स्वास्थ्य केंद्र आने की जरूरत कम हो सकती है।

और किसी गर्भवती महिला के लिए अस्पताल का एक चक्कर कम होना केवल समय बचना नहीं है।

उसका मतलब है—यात्रा का खर्च कम होना, परिवार पर निर्भरता कम होना और इलाज को समय पर पूरा कर पाना।

इसी वजह से FCM को लेकर स्वास्थ्य विभाग की पहल को केवल दवा की उपलब्धता के रूप में नहीं, बल्कि समय पर उपचार तक पहुंच के रूप में भी देखा जा रहा है।

रायबरेली से निकली पहल, प्रदेश तक पहुंची

इस व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में फरवरी 2026 में रायबरेली से प्रशिक्षण की शुरुआत हुई।

इसके बाद सीतापुर, हरदोई, रायबरेली, श्रावस्ती और बहराइच के फर्स्ट रेफरल यूनिट यानी FRU पर तैनात चिकित्सकों और स्टाफ नर्सों को FCM के इस्तेमाल तथा एनीमिया प्रबंधन के मानकों पर प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

तकनीकी सहयोग के लिए किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ और गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज, कानपुर को जोड़ा गया।

पांच जिलों से शुरू हुई यह प्रक्रिया अब प्रदेश के सभी जनपदों तक पहुंच चुकी है।

विभागीय आंकड़ों के अनुसार अब तक 10 हजार से अधिक FCM डोज लगाए जा चुके हैं।

सीतापुर में 28 अप्रैल को इलाज को विकेंद्रीकृत करने की शुरुआत

कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

FCM सेवाओं को जरूरतमंद महिलाओं के और करीब ले जाने के लिए विकेंद्रीकरण की दिशा में भी कदम बढ़ाया गया।

उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार 28 अप्रैल 2026 को सीतापुर में विकेंद्रीकृत FCM सेवाओं की शुरुआत हुई।

मकसद था कि मध्यम और गंभीर एनीमिया से जूझ रही गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं की पहचान समय रहते हो और उपचार के लिए उन्हें अनावश्यक रूप से दूर न जाना पड़े।

क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था में दूरी भी कई बार एक अदृश्य दीवार बन जाती है।

कुसुमा के छह ग्राम में छिपी थी एक पूरी कहानी

रायबरेली की कुसुमा देवी का नाम बदला हुआ है।

लेकिन उनकी कहानी में जो संख्या है, वह बदलने वाली नहीं है।

6 ग्राम।

आठवें महीने की गर्भावस्था में इतनी कमी ने उन्हें कमजोर कर दिया था। आयरन की गोलियां नियमित लेना भी संभव नहीं हो पा रहा था।

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सकों ने उनकी स्थिति को देखते हुए FCM देने की सलाह दी।

करीब एक महीने बाद जांच हुई।

12 ग्राम।

फिर पांच सितंबर आया।

कुसुमा ने सामान्य प्रसव से एक बच्चे को जन्म दिया।

2.8 किलोग्राम।

एक रिपोर्ट में छह से बारह तक पहुंचा हीमोग्लोबिन शायद सिर्फ एक मेडिकल आंकड़ा हो।

लेकिन कुसुमा के लिए यह आंकड़ा उस बच्चे तक पहुंचने का रास्ता था, जिसे वह अपनी गोद में लेकर घर लौट सकीं।

राष्ट्रीय स्तर पर भी अंतःशिरा आयरन पर जोर

वर्ष 2026 की एनीमिया मुक्त भारत संबंधी गाइडलाइन में गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए अंतःशिरा आयरन उपचार को सुरक्षित और मानकीकृत तरीके से लागू करने पर जोर दिया गया है।

राज्यों को चरणबद्ध तरीके से जिला अस्पताल और उससे ऊपर के संस्थानों से इसकी शुरुआत करने की सलाह दी गई है।

उत्तर प्रदेश में FCM की व्यवस्था को इसी व्यापक मातृ एनीमिया प्रबंधन प्रणाली के साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

अब असली कहानी आंकड़ों के बाद शुरू होगी

10 हजार से ज्यादा डोज एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है।

लेकिन किसी स्वास्थ्य कार्यक्रम की असली सफलता केवल इंजेक्शन की संख्या से नहीं मापी जाती।

आगे यह देखना होगा कि कितनी महिलाओं की समय पर पहचान हुई, कितनों को जरूरत के मुताबिक उपचार मिला, हीमोग्लोबिन में कितना सुधार हुआ, फॉलोअप कितना प्रभावी रहा और मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य पर इसका क्या असर पड़ा।

डॉ. पिंकी जोवेल के नेतृत्व में विकसित की जा रही यह व्यवस्था इसी व्यापक लक्ष्य की ओर बढ़ती दिखाई देती है—महिला की पहचान से उपचार और उपचार से फॉलोअप तक एक निरंतर स्वास्थ्य-श्रृंखला।

कुसुमा की कहानी इस पूरी कोशिश का एक मानवीय चेहरा है।

छह ग्राम से बारह ग्राम तक पहुंची उनकी रिपोर्ट सिर्फ खून में बढ़े हीमोग्लोबिन की कहानी नहीं है।

यह उस भरोसे की कहानी है जिसमें एक मां ने अपने बच्चे को जन्म देने से पहले अपने शरीर को फिर से मजबूत होते देखा।

और शायद मातृ स्वास्थ्य की किसी भी बड़ी योजना का सबसे खूबसूरत मतलब यही है—

मां सुरक्षित रहे, बच्चा स्वस्थ जन्म ले और इलाज बीमारी के बाद नहीं, सही समय पर उसके पास पहुंचे।

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