तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफा
कभी-कभी इतिहास बड़े महलों में नहीं लिखा जाता।
न कोई शाही फ़रमान होता है, न तोपों की सलामी, न संग-ए-मरमर की इमारत और न ही किसी बादशाह के नाम का सुनहरा ताज।
इतिहास कभी-कभी एक छोटे-से कमरे में बैठकर लिख दिया जाता है—जहाँ किसी के पास दौलत बहुत कम होती है, मगर दिल में दूसरों के लिए जगह बहुत बड़ी होती है।
सन् 1912 का वह दौर भी कुछ ऐसा ही था।
तालीम हर घर की पहुँच में नहीं थी। किसी गरीब बाप का होनहार बेटा किताबों की तरफ़ देखता तो आँखों में ख्वाब चमकते, लेकिन जेब में सिक्के नहीं होते। कोई बच्चा डॉक्टर बनना चाहता था, कोई वकील, कोई उस्ताद, कोई आलिम-ए-दीन—मगर रास्ते में सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो जाता था कि तालीम का ख़र्च कौन उठाएगा?
उसी दौर में दो साहिबान—मरहूम हाजी सैयद जलालुद्दीन हैदर और मरहूम नवाब सैयद मोहसिन मिर्ज़ा—ने शायद यह महसूस किया कि किसी समाज की असल दौलत उसकी ज़मीन-जायदाद नहीं, बल्कि उसके बच्चे होते हैं।
और फिर एक छोटी-सी शुरुआत हुई।
पूंजी थी—सिर्फ़ 4 रुपये 8 आने यानी 72 आने।
आज के ज़माने में शायद यह रकम किसी चाय की दावत के लिए भी कम लगे, लेकिन उस वक्त इन चंद सिक्कों में एक ऐसा ख़्वाब रखा गया था जिसकी कीमत रुपयों में नहीं लगाई जा सकती थी।
उस ख़्वाब का नाम था—
अंजुमन वज़ीफ़ा-ए-सादात-वा-मोमिनीन।
यह सिर्फ़ वज़ीफ़ा नहीं था, किसी के टूटते हुए ख़्वाब को सहारा देना था
अंजुमन का मक़सद साफ़ था—बिरादरी के ज़रूरतमंद, मुस्तहिक़ और लायक़ तालिब-ए-इल्म को क़र्ज़-ए-हसना दिया जाए।
यानी ऐसा क़र्ज़ जिसमें सूद नहीं, मुनाफ़ा नहीं और किसी मजबूर की मजबूरी से फ़ायदा उठाने की गुंजाइश नहीं।
तालिब-ए-इल्म पढ़े, आगे बढ़े, अपने पैरों पर खड़ा हो और फिर आसानी से क़िस्तों में वह रकम वापस करे, ताकि किसी दूसरे बच्चे के हाथ में वही मदद पहुँच सके।
यह सिलसिला दरअसल रुपयों की अदला-बदली नहीं था।
यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उम्मीद की विरासत पहुँचाने का सिलसिला था।
एक बच्चे को किताब मिली तो उसके साथ किसी माँ की दुआ चली।
किसी को कॉलेज की फ़ीस मिली तो उसके साथ किसी पिता की आँखों का सपना बच गया।
किसी ने डॉक्टर बनने की राह पकड़ी तो शायद किसी गरीब घर की वह बेटी थी जिसे हालात ने पहले ही बता दिया था कि बड़े सपने सिर्फ़ अमीरों के लिए होते हैं।
लेकिन अंजुमन ने कहा—
नहीं।
ख़्वाब पर किसी का इजारा नहीं।
और फिर छोटे-से बीज से एक दरख़्त निकल आया
साल गुजरते गए।
वह रकम बढ़ती गई।
मगर उससे कहीं ज़्यादा बढ़ती गईं वे ज़िंदगियाँ जिन्हें इस अंजुमन ने छुआ।
आज अंजुमन के सफ़र में नौ हज़ार से अधिक तालिब-ए-इल्म के नाम जुड़े हुए हैं।
उनमें से कितने इंजीनियर बने।
कितने डॉक्टर।
कितने वकील।
कितने उस्ताद।
कितने जज।
कितने एडमिनिस्ट्रेटर।
कितने बैंकर्स।
कितने मुसन्निफ़।
कितने फ़लसफ़ी।
कितने आलिम-ए-दीन।
और कुछ तो ऐसे भी हुए जिन्होंने मुल्क की सियासत में जाकर वज़ीर की ज़िम्मेदारियाँ निभाईं।
लेकिन शायद इस अंजुमन की सबसे बड़ी कामयाबी यह नहीं कि उसके लाभार्थियों में कितने बड़े ओहदों पर पहुँचे।
सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि—
जिस बच्चे के हाथ में कभी फीस भरने के पैसे नहीं थे, उसके हाथ में बाद में किसी और बच्चे की मदद करने की ताक़त आ गई।
यही तो क़र्ज़-ए-हसना की असल रूह है।
रकम वापस आती है।
लेकिन उसके साथ एक दुआ भी आती है।
और वह दुआ फिर किसी और ज़िंदगी में रोशनी बन जाती है।
2012—एक सदी पूरी हुई, मगर सफ़र ख़त्म नहीं हुआ
सन् 2012 में अंजुमन ने अपनी स्थापना की एक सदी पूरी की।
सौ साल!
एक इंसान के लिए सौ साल बहुत लंबा अरसा है।
लेकिन किसी ख़िदमत के सफ़र के लिए सौ साल शायद यह बताने के लिए काफ़ी होते हैं कि उसकी बुनियाद कितनी मज़बूत थी।
1912 में जिन हाथों ने 4 रुपये 8 आने से यह दीप जलाया था, शायद उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि एक दिन यह रोशनी हजारों घरों तक पहुँचेगी।
उन्होंने शायद सिर्फ़ इतना सोचा था—
एक बच्चा पढ़ जाए।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
और शायद यही सोचते-सोचते एक सदी गुजर गई।
अंजुमन की असल पूंजी क्या है?
काग़ज़ पर देखें तो अंजुमन की आमदनी के ज़राए हैं—रुक्नियत की फ़ीस, नामज़द फंड और लाभार्थियों से क़र्ज़ की वसूली।
लेकिन अगर दिल से पूछा जाए तो अंजुमन की असल पूंजी कुछ और है।
लोगों का भरोसा।
वह भरोसा जो किसी को यह कहने की हिम्मत देता है—
“मेरे पास आज पैसे नहीं हैं, लेकिन मेरे बच्चे में क़ाबिलियत है।”
और अंजुमन जवाब देती है—
“तो फिर तुम्हारे बच्चे का रास्ता बंद नहीं होगा।”
नामज़द फंड—याद को सदक़ा-ए-जारीया बनाने का रास्ता
दुनिया से जाने वाला हर इंसान अपने पीछे कुछ न कुछ छोड़ जाता है।
कोई मकान छोड़ता है।
कोई कारोबार।
कोई ज़मीन।
कोई तस्वीर।
मगर कुछ लोग अपनी याद को किसी और की ज़िंदगी में छोड़ जाते हैं।
अंजुमन का नामज़द फंड इसी सोच की खूबसूरत तस्वीर है।
आप अपने किसी मरहूम अज़ीज़ की याद में एक फंड शुरू कर सकते हैं।
फिर शायद किसी दिन कोई बच्चा उसी फंड से पढ़ेगा।
किसी दिन वह बच्चा डॉक्टर बनेगा।
या इंजीनियर।
या वकील।
या उस्ताद।
या आलिम।
और जब वह अपनी कामयाबी की दहलीज़ पर खड़ा होकर पीछे देखेगा, तो शायद उसे उस शख़्स का नाम दिखाई देगा जिसे उसने कभी देखा तक नहीं था—मगर जिसने उसकी तालीम में हिस्सा लिया था।
यही याद का सबसे खूबसूरत रूप है।
117 शहरों में फैला ख़िदमत का रिश्ता
आज अंजुमन के भारत और बैरून-ए-मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों में 117 लोकल सेक्रेटरी हैं।
ये सिर्फ़ ओहदेदार नहीं।
ये उस लंबे सफ़र के वे लोग हैं जो शहर-शहर जाकर अंजुमन और ज़रूरतमंद तालिब-ए-इल्म के बीच पुल बनते हैं।
वे रुक्नियत की फ़ीस जमा करते हैं।
क़र्ज़ की वसूली करते हैं।
नए अरकान बनाते हैं।
वज़ीफ़े के लिए दरख़्वास्तें जमा करते हैं।
ज़रूरतमंद बच्चों की पहचान करते हैं।
और उनकी दरख़्वास्तों को मंज़ूरी के लिए आगे बढ़ाते हैं।
इसलिए उन्हें अंजुमन की रीढ़ की हड्डी कहा जाए तो शायद गलत न होगा।
क्योंकि कोई भी इदारा सिर्फ़ अपने दफ़्तर से ज़िंदा नहीं रहता।
उसे ज़िंदा रखते हैं—
वे लोग जो उसके मक़सद को अपने दिल में लेकर चलते हैं।
सिर्फ़ डिग्री नहीं—ख़ुद्दारी भी
अंजुमन की सोच सिर्फ़ यह नहीं कि बच्चे पढ़ें और नौकरी हासिल कर लें।
उसके पीछे एक गहरी सामाजिक सोच है।
तालिब-ए-इल्म में ख़ुद्दारी पैदा हो।
उसमें ख़ुद-एतमादी पैदा हो।
उसे यह एहसास हो कि वह सिर्फ़ अपने घर का नहीं, अपनी बिरादरी और समाज का भी फ़र्द है।
आज वह मदद ले रहा है।
कल उसे किसी और का हाथ थामना है।
यानी—
जिस हाथ ने आज उसे उठाया है, कल वही हाथ किसी और को उठाने वाला बने।
यही एक समाज के आगे बढ़ने का रास्ता है।
एक अंजुमन, एक दस्तूर और एक अमानत
अंजुमन वज़ीफ़ा-ए-सादात-वा-मोमिनीन का अपना दस्तूर और बाइ-लॉज़ हैं।
इसकी सबसे आला बॉडी कारकुन कमेटी है और इसके ओहदेदार हर साल सालाना इजलास में मुन्तख़ब किए जाते हैं।
लेकिन दस्तूर और इंतज़ाम अपनी जगह हैं।
इदारे की असल रूह उन हजारों चेहरों में है जिनके लिए कभी किसी ने कहा था—
“इस बच्चे को पढ़ने का मौका मिलना चाहिए।”
अब यह कहानी आपकी है
1912 में दो लोगों ने शुरुआत की थी।
आज सवाल यह नहीं कि उन्होंने कितना दिया था।
सवाल यह है कि हम अपनी आने वाली नस्लों के लिए क्या छोड़कर जाएँगे?
एक मकान?
एक दुकान?
एक बैंक बैलेंस?
या फिर किसी बच्चे की आँख में चमकता हुआ भविष्य?
अगर कोई पूछे कि 4 रुपये 8 आने से क्या बदला जा सकता है, तो जवाब शायद अंजुमन की एक सदी से ज़्यादा पुरानी कहानी देती है—
एक छोटी रकम नहीं, एक बड़ी नीयत दुनिया बदलती है।
और अगर नीयत में ख़ुलूस हो तो चार रुपये आठ आने भी कभी-कभी हजारों ज़िंदगियों का रास्ता रोशन कर देते हैं।
यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई।
क्योंकि हर वह बच्चा जो आज किताब खोल रहा है, इस कहानी का अगला सफ़हा है।
हर वह शख़्स जो किसी ज़रूरतमंद तालिब-ए-इल्म का हाथ थामता है, इस कहानी का नया किरदार है।
और हर वह दुआ जो किसी कामयाब इंसान के दिल से अपने मददगार के लिए निकलती है—
शायद उसी 1912 के छोटे-से दीपक की लौ है।




