तहलका टुडे टीम/ मनोज शुक्ला
लखनऊ/रायबरेली। उत्तर प्रदेश जल निगम (ग्रामीण) की निविदा प्रक्रिया को लेकर ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने सरकारी टेंडरों की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रायबरेली के इंटेक्टर बुजुर्गी जोन-2 में 300 किलोलीटर क्षमता के निर्माणाधीन जलाशय और 20 मीटर स्टेजिंग से संबंधित अवशेष कार्यों की पुनर्निविदा में एक फर्म की बोली अस्वीकार किए जाने के बाद विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। शिकायतकर्ता ने एक्सईएन की भूमिका और NIC पोर्टल पर प्रदर्शित निविदा स्थिति की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
🔥 टेंडर पोर्टल पर अलग-अलग स्थिति, आखिर किस आधार पर हुआ फैसला?
मेसर्स बंधु इंटरप्राइजेज के प्रोपराइटर सैयद शब्बीर अहमद की ओर से 26 अक्टूबर 2026 को भेजे गए शिकायत पत्र के अनुसार, पुनर्निविदा संख्या 2415/M-7/62 में फर्म ने 20 अक्टूबर को ऑनलाइन बोली प्रस्तुत की थी और ₹3,540 निविदा शुल्क जमा किया था।
शिकायतकर्ता का कहना है कि 26 अक्टूबर को उपलब्ध पोर्टल रिकॉर्ड में उसकी बोली के सामने ‘NOT ADMITTED’ और टिप्पणी में ‘REJECTED’ प्रदर्शित हो रहा था, जबकि अन्य प्रतिभागियों के सामने ‘TO BE OPENED’ दर्ज था।
यहीं से सवाल उठता है—क्या सभी निविदादाताओं के दस्तावेजों का मूल्यांकन समान मानकों पर हुआ? क्या बोली अस्वीकार करने के कारणों का विधिवत आदेश दिया गया? और क्या शिकायतकर्ता को अपनी आपत्ति का जवाब पाने का उचित अवसर मिला?
⚠️ एक्सईएन की कार्यप्रणाली पर सवाल, NIC की भूमिका की जांच की मांग
शिकायत में पूर्व में जारी प्रतिबंध का हवाला देकर बोली अस्वीकार किए जाने और उस पर पुनर्विचार के लिए भेजे गए पत्रों के बावजूद कारणयुक्त निर्णय उपलब्ध नहीं कराए जाने का आरोप लगाया गया है।
इस घटनाक्रम के बाद निविदा प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका तथा पोर्टल पर दर्ज तकनीकी स्थिति की जांच की मांग उठी है। शिकायतकर्ता ने सभी प्रतिभागियों की पात्रता, तकनीकी दस्तावेजों, मूल्यांकन रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक ऑडिट ट्रेल की जांच कराने का अनुरोध किया है।
क्या निविदा प्रक्रिया में किसी स्तर पर अनुचित लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई? क्या तकनीकी अस्वीकृति के पीछे ठोस नियमगत आधार था? इन सवालों का जवाब स्वतंत्र जांच और मूल डिजिटल रिकॉर्ड की पड़ताल से ही सामने आ सकता है।
फिलहाल उपलब्ध शिकायत पत्र से एक्सईएन और NIC कर्मचारियों की मिलीभगत या आर्थिक लेन-देन की पुष्टि नहीं होती। इसलिए किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराने से पहले निष्पक्ष जांच जरूरी है।
💥 ‘खाने-कमाने’ की खुराफात के आरोपों पर उठी जवाबदेही की मांग
सरकारी निर्माण कार्यों की निविदाओं में पारदर्शिता को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। इस मामले में भी शिकायतकर्ता की मांग है कि किसी भी अधिकारी को नियमों से ऊपर न रखा जाए और यदि जांच में पद के दुरुपयोग, पक्षपात या डिजिटल प्रक्रिया में अनियमितता के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
अब सवाल यह है कि संबंधित एक्सईएन और विभागीय अधिकारी इस शिकायत पर क्या जवाब देते हैं? क्या NIC पोर्टल के लॉग, टाइम-स्टैम्प, तकनीकी मूल्यांकन और अस्वीकृति के कारण सार्वजनिक किए जाएंगे? या शिकायतकर्ता को जवाब के लिए विभागीय कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ेंगे?
शासन-प्रशासन तक पहुंची शिकायत, पांच बिंदुओं पर कार्रवाई की मांग
शिकायत की प्रतिलिपि नमामि गंगे एवं ग्रामीण जलापूर्ति विभाग के अपर मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश जल निगम (ग्रामीण) के प्रबंध निदेशक और मुख्य अभियंता (ग्रामीण) को भेजे जाने का उल्लेख है।
प्रमुख मांगें हैं—
- बोली अस्वीकार करने का कारणयुक्त लिखित आदेश उपलब्ध कराया जाए।
- सभी निविदादाताओं के तकनीकी दस्तावेजों का समान मानकों पर परीक्षण हो।
- NIC पोर्टल के रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक ऑडिट ट्रेल की जांच की जाए।
- शिकायत का निस्तारण मूल्यांकन प्रक्रिया से अलग अधिकारी या समिति से कराया जाए।
- यदि अनियमितता प्रमाणित हो, तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
अब जवाबदेही से नहीं बच पाएगा मामला?
यह विवाद अब केवल एक फर्म की बोली अस्वीकार किए जाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि सरकारी टेंडर प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करना जरूरी है। वहीं, यदि अस्वीकृति नियमों के अनुरूप हुई है, तो विभाग को उसके स्पष्ट दस्तावेजी कारण सामने रखने चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल—क्या जल निगम इस शिकायत की निष्पक्ष जांच कराकर टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता साबित करेगा?
नोट: यह समाचार शिकायत पत्र में दर्ज तथ्यों और आरोपों पर आधारित है। एक्सईएन, NIC तथा संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
जनहित में सवाल, जवाबदेही की मांग।




