तहलका टुडे | विशेष राजनीतिक रिपोर्ट
कभी-कभी एक घर में पसरा सन्नाटा विधानसभा की बहसों से कहीं ज्यादा शोर पैदा करता है। किसी पिता की आंखों में ठहरा हुआ इंतजार, किसी मां की अधूरी पुकार और एक नौजवान की अचानक खत्म हो गई जिंदगी… ये सब मिलकर ऐसे सवाल खड़े कर देते हैं, जिनका जवाब सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी से नहीं मिलता। जवाब चाहिए होता है—जांच से, इंसाफ से और उस व्यवस्था से, जिसके हाथ में कानून की किताब भी है और उसे लागू करने की जिम्मेदारी भी।
बाराबंकी से प्रयागराज तक फैली एक जमीन की कहानी अब उत्तर प्रदेश की सियासत के गलियारों में पहुंच गई है। कहानी के केंद्र में हैं युवा अधिवक्ता अभिनव यादव, उनके पिता अधिवक्ता अजय कुमार यादव, बाराबंकी के समाजवादी पार्टी विधायक धर्मराज उर्फ सुरेश यादव और प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर।
एक पिता ने अपने बेटे की मौत को लेकर मुख्यमंत्री के दरवाजे पर दस्तक दी है। दूसरी ओर सरकार के ही एक मंत्री ने सोशल मीडिया पर ऐसा राजनीतिक हमला बोला है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव को सीधे जवाबदेही के कठघरे में खड़ा कर दिया है।
सवाल अब केवल एक फेसबुक पोस्ट का नहीं है। सवाल यह है कि अभिनव यादव की मौत के पीछे की पूरी सच्चाई क्या है?
‘लोफर लौंडों के दम पर सत्ता के सपने मत देखिए’—राजभर ने अखिलेश को क्यों घेरा?
उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने अपने फेसबुक पेज पर अखिलेश यादव को संबोधित करते हुए तीखी टिप्पणी की है।
उन्होंने लिखा—
“लोफर लौंडों के दम पर सत्ता के सपने मत देखिए। सपने से बाहर आकर सच्चाई देखिए।”
राजभर ने अपनी पोस्ट में बाराबंकी के सदर विधायक धर्मराज उर्फ सुरेश यादव पर आरोप लगाया कि किसानों की जमीन से जुड़े विवाद में उनके कथित हस्तक्षेप और दबाव के चलते एक युवा अधिवक्ता के बेटे अभिनव यादव की जान चली गई।
मंत्री ने अखिलेश यादव की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि मृतक भी यादव समाज का ही होनहार नौजवान था। फिर उसके साथ कथित अन्याय के मामले में सपा नेतृत्व आवाज क्यों नहीं उठा रहा?
राजभर ने अपने पोस्ट में पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव का जिक्र करते हुए लिखा कि यदि वह जीवित होते तो शायद ऐसी स्थिति नहीं बनने देते।
उनका हमला केवल बाराबंकी तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने जौनपुर के एक अन्य मामले का उल्लेख करते हुए सपा विधायक लकी यादव और अखिलेश यादव की राजनीतिक भूमिका पर भी सवाल उठाए।
राजभर ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी अपने नेताओं और विधायकों के मामलों में चयनात्मक रवैया अपनाती है और यही भेदभाव उसकी राजनीतिक कमजोरी बन रहा है।
डेढ़ करोड़ रुपये की जमीन… और एक पिता की शिकायत
इस राजनीतिक विवाद के पीछे एक ऐसा प्रार्थना पत्र है, जिसकी हर पंक्ति में एक परिवार की शिकायत और इंसाफ की मांग दर्ज है।
अधिवक्ता अजय कुमार यादव ने 6 नवंबर 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संबोधित प्रार्थना पत्र देकर अपने पुत्र अभिनव यादव की मौत की सीबीआई जांच कराने की मांग की है।
प्रार्थना पत्र में बताया गया है कि अजय कुमार यादव बाराबंकी सिविल कोर्ट और लखनऊ हाईकोर्ट में अधिवक्ता हैं। उनके अनुसार, उनके पुत्र अभिनव यादव प्रयागराज के कैंट थाना क्षेत्र में सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे थे।
शिकायत में बाराबंकी के ग्राम सरदली उमरपुर, तहसील नवाबगंज की जमीन से संबंधित विवाद का उल्लेख है।
अजय कुमार यादव का आरोप है कि वह गरीब किसानों की ओर से जमीन के मामले में पैरवी कर रहे थे। इस दौरान कुछ प्रभावशाली लोगों के साथ उनका विवाद बढ़ता गया।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जमीन की पैरवी छोड़ने के बदले करीब डेढ़ करोड़ रुपये देने की बात कही गई और ऐसा नहीं करने पर उन्हें तथा उनके परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई।
उन्होंने यह भी बताया कि 17 सितंबर 2026 को पुलिस अधीक्षक बाराबंकी को इस संबंध में शिकायत दी गई थी, लेकिन उनके अनुसार कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
23 अक्टूबर 2026: प्रयागराज में खत्म हो गई एक जिंदगी
शिकायत के मुताबिक, 23 अक्टूबर 2026 को प्रयागराज के कैंट थाना क्षेत्र में अभिनव यादव की मौत हो गई।
लेकिन पिता इस मौत को सामान्य घटना मानने को तैयार नहीं हैं।
मुख्यमंत्री को दिए गए प्रार्थना पत्र में उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके बेटे की हत्या कर उसे आत्महत्या का रूप देने का प्रयास किया गया।
अजय कुमार यादव ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि घटना के बाद उन्हें अपने बेटे का शव देखने तक नहीं दिया गया और शव को स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस में रखे जाने की जानकारी भी उन्हें बाद में मिली।
शिकायत में पोस्टमार्टम की प्रक्रिया, शरीर पर कथित चोटों के उल्लेख और पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
पिता का आरोप है कि घटनास्थल से महत्वपूर्ण साक्ष्य मिटाए गए और मामले की निष्पक्ष जांच में बाधा पहुंचाई गई।
प्रार्थना पत्र में प्रयागराज के कैंट थाने में दर्ज अपराध संख्या 234/26 का उल्लेख करते हुए मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की गई है।
यह सभी आरोप शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि और पुलिस की आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने आना अभी बाकी है।
राजभर के निशाने पर अखिलेश, जौनपुर का मामला भी उठाया
ओमप्रकाश राजभर ने अपनी फेसबुक पोस्ट में जौनपुर के एक अन्य हत्याकांड का भी उल्लेख किया।
उन्होंने सपा विधायक लकी यादव पर विशाल यादव की हत्या के आरोपियों को बचाने का आरोप लगाया और अखिलेश यादव पर अपने विधायकों को संरक्षण देने का सवाल उठाया।
राजभर ने अपने पोस्ट में पिछड़े और दलित समाज के साथ कथित भेदभाव का मुद्दा भी उठाया।
उनकी टिप्पणी का राजनीतिक संदेश साफ था—सत्ता की राजनीति में जातीय पहचान से ऊपर उठकर हर पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए।
एक तरफ सत्ता का मंत्री, दूसरी तरफ विपक्ष का विधायक
इस घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और गंभीर राजनीतिक पहलू यह है कि बाराबंकी के एक स्थानीय जमीन विवाद से जुड़ा मामला अब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सीधी राजनीतिक टकराहट का विषय बन गया है।
एक तरफ योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर हैं, जो सार्वजनिक रूप से सपा विधायक पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं, जिनसे राजभर इस मामले पर जवाब मांग रहे हैं।
और इन दोनों राजनीतिक ध्रुवों के बीच एक परिवार है, जो अपने बेटे की मौत की निष्पक्ष जांच चाहता है।
राजनीति में बयान आते हैं, जवाब दिए जाते हैं, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है और फिर अक्सर कोई नया मुद्दा पुराने सवालों को पीछे छोड़ देता है। लेकिन जिस परिवार ने अपना बेटा खोया है, उसके लिए यह मामला किसी राजनीतिक कैलेंडर की तारीख नहीं है।
उसके लिए यह जिंदगी भर का सवाल है।
अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उम्मीद
अधिवक्ता अजय कुमार यादव ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि प्रयागराज के कैंट थाना क्षेत्र में दर्ज अपराध संख्या 234/26 की जांच सीबीआई से कराई जाए। साथ ही उन्हें और उनके परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए।
अब निगाहें मुख्यमंत्री कार्यालय, गृह विभाग, प्रयागराज पुलिस और संबंधित जांच एजेंसियों पर हैं।
क्या इस शिकायत पर उच्चस्तरीय जांच होगी? क्या जमीन विवाद से जुड़े आरोपों की पड़ताल होगी? क्या पोस्टमार्टम और पुलिस कार्रवाई से संबंधित शिकायतों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? और क्या मृतक अभिनव यादव के परिवार को वह न्याय मिल पाएगा, जिसकी मांग उसका पिता कर रहा है?
इन सवालों के जवाब अभी आने बाकी हैं।
क्योंकि लोकतंत्र में किसी विधायक की कुर्सी बड़ी हो सकती है, किसी मंत्री का बयान प्रभावशाली हो सकता है और किसी पार्टी का राजनीतिक वजूद महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन कानून की नजर में इंसाफ का हक हर नागरिक का बराबर है।
अभिनव यादव की मौत के मामले में सच क्या है, यह जांच से सामने आना चाहिए। आरोप चाहे किसी पर भी हों, न तो राजनीतिक रसूख जांच से ऊपर होना चाहिए और न ही किसी को बिना जांच दोषी ठहराया जाना चाहिए।
सवाल भी यही है—एक पिता अपने बेटे की मौत का सच जानने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर क्यों हो?




