तहलका टुडे टीम /क़मर अब्बास
अयोध्या/बाराबंकी। करबला सिविल लाइंस की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की भूमि से जुड़े बहुचर्चित विवाद में अज़ादारों को बड़ी राहत मिली है। लगभग 11 वर्षों से चल रहे भूचित्र संशोधन मामले में खालिदा रसूल पत्नी स्वर्गीय मिसबाहुल रसूल उर्फ प्यारे मियां, नावेद रसूल तथा शाद रसूल को लगातार दूसरी न्यायिक हार का सामना करना पड़ा है। पहले अपर कलेक्टर (न्यायिक) बाराबंकी ने वाद संख्या 988/2015 को निरस्त किया और बाद में अयोध्या मण्डल की अपर आयुक्त (न्यायिक) ऋतु पूनिया ने अपील संख्या 543/2026 को भी खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।
क्या था पूरा मामला
वर्ष 2015 में खालिदा रसूल एवं अन्य द्वारा ग्राम बड़ेल स्थित गाटा संख्या 438/0.167 हेक्टेयर भूमि के भूचित्र (नक्शे) में संशोधन की मांग करते हुए वाद दायर किया गया था। वादी पक्ष का दावा था कि वर्तमान भूचित्र सही नहीं है तथा इसे पुराने अभिलेखों के अनुरूप संशोधित किया जाना चाहिए।
मामला वर्षों तक विभिन्न न्यायालयों और विभागीय परीक्षणों के बीच चलता रहा। सुनवाई के दौरान चकबंदी विभाग एवं बन्दोबस्त अधिकारी चकबंदी, बाराबंकी से कई बार रिपोर्ट मांगी गई।
विभागीय रिपोर्ट में क्या सामने आया
बन्दोबस्त अधिकारी चकबंदी द्वारा प्रस्तुत अभिलेखीय परीक्षण रिपोर्ट में कहा गया कि वादी पक्ष द्वारा सन् 1331 फसली के प्रमाणित नक्शे की प्रति, उसका हिन्दी अनुवाद तथा अन्य आवश्यक अभिलेख न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किए गए।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पत्रावली में केवल हाथ से बना एक नजरी नक्शा प्रस्तुत किया गया था, जो न तो प्रमाणित था और न ही उसका कोई निर्धारित पैमाना था। आवश्यक अभिलेख उपलब्ध न होने के कारण भूचित्र संशोधन के समर्थन में कोई स्पष्ट रिपोर्ट देना संभव नहीं था।
अपर कलेक्टर ने क्यों खारिज किया वाद
09 अक्टूबर 2025 को पारित आदेश में अपर कलेक्टर (न्यायिक) बाराबंकी ने कहा कि वादी पक्ष को पर्याप्त अवसर दिए गए, लेकिन आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए गए। न्यायालय ने यह भी पाया कि विभागीय रिपोर्ट के विरुद्ध कोई प्रभावी आपत्ति भी दाखिल नहीं की गई।
न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अभिलेखीय साक्ष्यों के अभाव में वाद पोषणीय नहीं है और इसे निरस्त कर दिया।
अयोध्या मण्डल के अपर आयुक्त न्यायालय की अपील में भी नहीं मिली राहत
अपर कलेक्टर के आदेश को चुनौती देते हुए खालिदा रसूल द्वारा अयोध्या मण्डल के अपर आयुक्त न्यायालय में अपील दायर की गई। अपील की सुनवाई के दौरान अपर आयुक्त ने पाया कि निचली अदालत ने पर्याप्त अवसर प्रदान किए थे और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर ही आदेश पारित किया था।
08 जून 2026 को पारित आदेश में अपर आयुक्त ने कहा कि अपीलकर्ता ऐसा कोई नया साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके जिससे निचली अदालत के आदेश में कोई त्रुटि सिद्ध हो सके। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि आवश्यक अभिलेखों की अनुपस्थिति में वाद निरस्त करना उचित था।
फलस्वरूप अपील को ग्राह्यता स्तर पर ही खारिज कर दिया गया।
दो न्यायालयों का एक समान निष्कर्ष
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों न्यायालयों ने अपने आदेशों में एक समान निष्कर्ष निकाला कि भूचित्र संशोधन के समर्थन में पर्याप्त और प्रमाणित अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए गए। इसी कारण न केवल मूल वाद असफल रहा बल्कि उसके विरुद्ध दायर अपील भी सफल नहीं हो सकी।
सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा ने कहा—“करबला की हिफाज़त का संघर्ष जारी रहेगा”
करबला सिविल लाइंस की भूमि से जुड़े मामलों को वर्षों से उठाते रहे वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और खादिम-ए-करबला सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा ने न्यायालयों के हालिया आदेशों को महत्वपूर्ण बताया है।
उन्होंने कहा कि पिछले कई दशकों से करबला सिविल लाइंस की भूमि को लेकर विवाद और अतिक्रमण के प्रयासों की शिकायतें उठती रही हैं तथा प्रशासन द्वारा विभिन्न अवसरों पर कार्यवाही भी की गई है। उनके अनुसार करबला की भूमि केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं बल्कि धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत है।
सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा का कहना है कि करबला की भूमि की सुरक्षा के लिए उनका संघर्ष वर्षों से जारी है और आगे भी जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि किसी भी भूमि संबंधी दावे का परीक्षण प्रमाणित अभिलेखों और कानून के आधार पर होना चाहिए तथा करबला की भूमि को लेकर समाज को सजग रहने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि करबला सिविल लाइंस की पवित्रता और ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखने के लिए वे वैधानिक और लोकतांत्रिक माध्यमों से अपनी आवाज उठाते रहेंगे तथा जहां कहीं भी अवैध अतिक्रमण की शिकायतें होंगी, वहां कानून के अनुसार कार्यवाही की मांग करते रहेंगे।
अज़ादारों में संतोष का माहौल
स्थानीय अज़ादारों का कहना है कि न्यायालयों के हालिया आदेशों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भूमि संबंधी दावों को स्वीकार कराने के लिए ठोस और प्रमाणित अभिलेख आवश्यक हैं। उनका मानना है कि करबला जैसी ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा पूरे समाज की जिम्मेदारी है और इस दिशा में न्यायालयों द्वारा पारित आदेश महत्वपूर्ण संदेश देते हैं।
करीब 11 वर्षों तक चले इस विवाद में अब तक का न्यायिक निष्कर्ष यही है कि प्रस्तुत दावा आवश्यक अभिलेखीय साक्ष्यों के अभाव में सिद्ध नहीं हो सका और वादी पक्ष को वाद तथा अपील दोनों स्तरों पर राहत नहीं मिली।




