तहलका टुडे /हसनैन मुस्तफा
लखनऊ।तपती हुई करबला की रेत… तीन दिन की प्यास… मासूम सकीना (स.अ.) की “अल-अतश… अल-अतश…” की सदाएं… छह माह के अली असग़र (अ.) का प्यासा गला… और इंसानियत की हिफाज़त के लिए अपने घराने के 72 वफ़ादार साथियों सहित सब कुछ कुर्बान कर देने वाले हज़रत इमाम हुसैन (अ.) की याद में राजधानी लखनऊ का वातावरण ग़म, अकीदत और इंसानियत की ख़िदमत के जज़्बे से भर उठा।
9 मोहर्रम को हुसैनी ब्लड डोनर क्लब (हुसैनी वेलफेयर सोसाइटी) के तत्वावधान में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के सहयोग से इमामबाड़ा गुफरानमआब, चौक में आयोजित “हुसैनी लहू – देश के लिए” स्वैच्छिक रक्तदान शिविर ने मोहर्रम की अज़ादारी को इंसानियत की सेवा से जोड़ते हुए एक प्रेरक संदेश दिया।
इससे पूर्व भारत की सुप्रीम रिलीजियस अथॉरिटी, आफताब-ए-शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी ने 9 मोहर्रम की दर्दभरी मजलिस में करबला के मसायब बयान किए। जैसे-जैसे प्यासे शहीदों, मासूम बच्चों और अहलेबैत (अ.) की मुसीबतों का ज़िक्र होता गया, मजलिस में मौजूद हजारों अज़ादारों की आंखें अश्कबार होती चली गईं। उन्होंने अपने ख़िताब में इंसाफ़, इंसानियत और मानव सेवा को इमाम हुसैन (अ.) के पैग़ाम का अहम हिस्सा बताया।
मजलिस समाप्त होते ही इमामबाड़ा गुफरानमआब का दृश्य बदल गया। मातम की सदाओं के बीच बड़ी संख्या में अज़ादार नौजवान, महिलाएं और बुज़ुर्ग रक्तदान शिविर की ओर बढ़े। कई प्रतिभागियों ने कहा कि वे करबला के प्यासे शहीदों की याद में अपना एक यूनिट रक्त इंसानियत को समर्पित कर रहे हैं। उनके लिए यह रक्तदान ही अपनी अकीदत और सामाजिक ज़िम्मेदारी का इज़हार था।
इस मिशन की शुरुआत सबसे पहले इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) के नायब, आयतुल्लाह अल-उज़्मा सैयद अली सिस्तानी के भारत स्थित प्रतिनिधि कार्यालय के सवाल-जवाब शोबे के इंचार्ज, काला इमामबाड़ा मस्जिद के पेश इमाम एवं प्रख्यात लेखक मौलाना सैयद अली हाशिम आब्दी ने रक्तदान कर की। उनके साथ काकोरी के शिक्षक महेंद्र कुमार ने भी सबसे पहले रक्तदान किया। दोनों ने मिलकर यह संदेश दिया कि कर्बला का पैग़ाम किसी एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है।

शिविर की सबसे भावुक तस्वीर तब सामने आई जब बड़ी संख्या में कनीज़ान-ए-सैयदा (महिलाओं) ने भी आगे बढ़कर रक्तदान किया। उन्होंने हज़रत ज़ैनब (स.अ.) के सब्र, हिम्मत और करबला की महिलाओं की अज़ीम कुर्बानियों को याद करते हुए अपना नज़राना-ए-अकीदत पेश किया। उनकी भागीदारी ने यह संदेश दिया कि हुसैनियत की विरासत को आगे बढ़ाने में महिलाओं की भूमिका भी उतनी ही अहम है जितनी पुरुषों की।
शिविर में हर धर्म और समुदाय के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और महिलाओं तथा पुरुषों सहित कुल 191 यूनिट रक्तदान कर एक ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया। रक्तदान करने वाले युवाओं ने कहा कि यदि उनके रक्त की एक यूनिट किसी घायल, किसी बच्चे, किसी मां या किसी अजनबी की जान बचा सके, तो इससे बढ़कर इमाम हुसैन (अ.) को कोई नज़राना-ए-अकीदत नहीं हो सकता।
आयोजकों ने कहा कि इस अभियान का उद्देश्य केवल रक्त एकत्र करना नहीं, बल्कि समाज में यह भावना जगाना है कि करबला का संदेश इंसानियत को बचाने का संदेश है। आज का हुसैनी नौजवान अपने लहू को मानव जीवन की रक्षा के लिए समर्पित कर रहा है, ताकि किसी अस्पताल में कोई मरीज समय पर रक्त के अभाव में अपनी जान न गंवाए।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में डॉ. कामिल रिज़वी, रेहान रज़ा रिज़वी, हुसैनी ब्लड डोनर क्लब के सभी पदाधिकारियों, चिकित्सकों, स्वयंसेवकों और 191 रक्तदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
हुसैनियत का नया पैग़ाम
“करबला में इमाम हुसैन (अ.) ने अपना लहू इंसानियत, इंसाफ़ और सत्य की रक्षा के लिए पेश किया था। आज उसी याद में अगर किसी ज़रूरतमंद की नसों में हमारा रक्त दौड़कर उसे नई ज़िंदगी दे, तो यही हुसैनियत का ज़िंदा पैग़ाम है, यही इंसानियत की सबसे बड़ी ख़िदमत है और यही इमाम हुसैन (अ.) तथा करबला के 72 शहीदों को हमारी सच्ची नज़राना-ए-अकीदत है।”




