तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफा
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी राजेश कुमार सिंह के खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्रवाई को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि अधिकारी को CBI की क्लोजर रिपोर्ट का विरोध करने का कोई स्पष्ट निर्देश दिया गया था। ऐसे में विशेष CBI अदालत के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट पर ‘नो ऑब्जेक्शन’ देना अपने आप में विभागीय misconduct नहीं माना जा सकता।
Writ-A No. 2677 of 2026 में न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने 28 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए राजेश कुमार सिंह की याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), लखनऊ के 19 दिसंबर 2025 के उस आदेश में भी हस्तक्षेप किया, जिसके माध्यम से अधिकारी की चुनौती को स्वीकार नहीं किया गया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वजीत सिंह,पुनीत चंद्रा ने की राजेश कुमार सिंह की पैरवी
हाईकोर्ट में राजेश कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री विश्वजीत सिंह ने पैरवी की, जबकि उनके साथ अधिवक्ता श्री पुनीत चंद्र ने सहयोग किया। केंद्र सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया श्री एस.बी. पांडेय उपस्थित हुए और उनके साथ अधिवक्ता श्री राज कुमार सिंह ने पक्ष रखा। राज्य सरकार की ओर से स्टैंडिंग काउंसिल भी अदालत में उपस्थित था।
मामले की शुरुआत कहां से हुई?
मामला केंद्र सरकार के Department of Heavy Industry में राजेश कुमार सिंह की सेवा के दौरान सामने आए एक आपराधिक प्रकरण से जुड़ा था। रिकॉर्ड के अनुसार उस समय वह विभाग में Joint Secretary के पद पर कार्यरत थे।
मामला M/s Bridge and Roof Co. (India) Ltd., Kolkata के तत्कालीन Chief Managing Director एम.के. सिंह से संबंधित आपराधिक कार्यवाही से जुड़ा था। मामले में CBI जांच हुई और जांच के बाद CBI ने अदालत के समक्ष closure report दाखिल की।
CBI की जांच में FIR में लगाए गए कुछ गंभीर आरोपों की पुष्टि नहीं हुई, हालांकि CBI ने कुछ अधिकारियों के खिलाफ Purchase Manual और CVC Guidelines से संबंधित कथित अनियमितताओं को लेकर विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की थी।
20 अगस्त 2018 के पत्र बने विवाद की मुख्य वजह
पूरे विभागीय विवाद की जड़ 20 अगस्त 2018 को जारी किए गए दो पत्र थे। विभागीय कार्रवाई में यह आरोप लगाया गया कि राजेश कुमार सिंह को विशेष CBI अदालत में उपस्थित होकर विभाग की ओर से उचित पक्ष रखना था और CBI की क्लोजर रिपोर्ट का विरोध करना था।
लेकिन राजेश कुमार सिंह की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि संबंधित पत्रों में ऐसा कोई स्पष्ट निर्देश मौजूद ही नहीं था जिसमें उन्हें CBI की क्लोजर रिपोर्ट का विरोध करने के लिए कहा गया हो।
हाईकोर्ट ने भी इन्हीं दोनों पत्रों की जांच को मामले में निर्णायक माना। अदालत ने कहा कि इन पत्रों को पढ़ने से यह स्पष्ट निर्देश नहीं मिलता कि अधिकारी को विशेष CBI अदालत में जाकर क्लोजर रिपोर्ट का विरोध करना था।
1 सितंबर 2018 को अदालत में क्या हुआ?
रिकॉर्ड के अनुसार राजेश कुमार सिंह 1 सितंबर 2018 को विशेष CBI अदालत के समक्ष उपस्थित हुए। वहां CBI की ओर से दाखिल क्लोजर रिपोर्ट पर उन्होंने ‘No Objection’ दिया।
यही कदम बाद में उनके खिलाफ विभागीय चार्जशीट का मुख्य आधार बना। आरोप लगाया गया कि उन्होंने सरकार के हितों की पर्याप्त पैरवी नहीं की और विभाग से प्राप्त निर्देशों के विपरीत जाकर क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार किए जाने पर आपत्ति नहीं की।
राजेश कुमार सिंह की ओर से अदालत में इसका विरोध करते हुए कहा गया कि जिस कथित निर्देश के उल्लंघन को misconduct बताया जा रहा है, वह निर्देश रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से मौजूद ही नहीं था।
विभागीय चार्जशीट और CAT का आदेश
राजेश कुमार सिंह के खिलाफ विभागीय चार्जशीट 27 अप्रैल 2023 को जारी की गई। इसमें मुख्य आरोप यही था कि उन्होंने विशेष CBI अदालत के समक्ष CBI की closure report पर ‘no objection’ देकर विभागीय निर्देशों का उल्लंघन किया और सरकारी हितों की रक्षा नहीं की।
अधिकारी ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, लखनऊ का दरवाजा खटखटाया। हालांकि CAT ने 19 दिसंबर 2025 को उनकी चुनौती स्वीकार नहीं की।
इसके बाद राजेश कुमार सिंह ने हाईकोर्ट में Writ-A No. 2677 of 2026 दाखिल की।
हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल क्या था?
हाईकोर्ट के सामने मूल सवाल यह था कि क्या राजेश कुमार सिंह द्वारा विशेष CBI अदालत में closure report पर ‘no objection’ दिया जाना विभागीय misconduct माना जा सकता है, जबकि रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट निर्देश उपलब्ध नहीं था कि उन्हें closure report का विरोध करना ही था।
राजेश कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वजीत सिंह ने तर्क दिया कि चार्जशीट का पूरा आधार ही ऐसे कथित निर्देश पर टिका है, जो संबंधित पत्रों में मौजूद नहीं है। इसलिए आरोप की बुनियाद ही कमजोर है।
अदालत ने इस तर्क को रिकॉर्ड के आधार पर परखा और 20 अगस्त 2018 के दोनों पत्रों का परीक्षण किया।
सरकार की ओर से क्या दलील दी गई?
केंद्र सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं Deputy Solicitor General of India एस.बी. पांडेय ने याचिका का विरोध किया। उनका कहना था कि मामले में गंभीर आरोप थे और CBI ने जांच की थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि CBI ने कुछ अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की थी और राजेश कुमार सिंह द्वारा closure report पर no objection दिया जाना misconduct के दायरे में आता है।
इस प्रकार हाईकोर्ट के सामने दोनों पक्षों की दलीलें थीं—एक ओर अधिकारी का यह कहना कि कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था, दूसरी ओर केंद्र सरकार का यह पक्ष कि अधिकारी ने विभागीय अपेक्षा के विपरीत कार्य किया।
हाईकोर्ट ने दोनों पत्रों की बारीकी से जांच की
अदालत ने पाया कि 20 अगस्त 2018 के दोनों पत्रों में अधिकारी को विशेष CBI अदालत में उपस्थित होने के संबंध में निर्देश तो दिए गए थे, लेकिन closure report का विरोध करने अथवा उसके खिलाफ कोई निश्चित stand लेने का स्पष्ट निर्देश नहीं था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इन पत्रों की साधारण भाषा से यह नहीं निकलता कि राजेश कुमार सिंह को अदालत में CBI की closure report का विरोध करना ही था।
‘नो ऑब्जेक्शन’ को कोर्ट ने क्यों नहीं माना misconduct?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि अधिकारी ने closure report पर no objection दिया, इसे misconduct नहीं कहा जा सकता, जब कोई स्पष्ट सरकारी निर्देश ही मौजूद नहीं था जिसका उल्लंघन हुआ हो।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई material नहीं है जिससे यह साबित हो कि राजेश कुमार सिंह को closure report का विरोध करने का निर्देश दिया गया था।
अदालत ने यह भी माना कि विशेष CBI अदालत को closure report पर अपने न्यायिक विवेक से निर्णय लेना था। अधिकारी द्वारा no objection दिए जाने मात्र से अदालत का स्वतंत्र अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी—Bona fide निर्णय को बाद में अपराध न बनाया जाए
फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा लिए जाने वाले bona fide निर्णयों से संबंधित है।
अदालत ने कहा कि अधिकारियों द्वारा परिस्थितियों में लिए गए निर्णयों को बाद में केवल इस आधार पर अत्यधिक सूक्ष्म जांच का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए कि विभाग की नजर में अधिकारी कोई दूसरा या अधिक prudent निर्णय ले सकता था।
अदालत के अनुसार यदि निर्णय में malafide, ulterior motive या corrupt consideration नहीं है तो केवल निर्णय के परिणाम या विभागीय अपेक्षा से अलग होने के आधार पर उसे misconduct में बदलना उचित नहीं है।
दुर्भावना या भ्रष्ट मंशा का प्रमाण नहीं मिला
हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि उपलब्ध रिकॉर्ड में राजेश कुमार सिंह के निर्णय को किसी malice, bad faith, corrupt consideration या personal gain से जोड़ने वाला कोई निष्कर्ष नहीं है।
अदालत ने कहा कि केवल विभागीय अपेक्षा के विपरीत बयान या निर्णय लेने से bona fide exercise of judgment अपने आप disciplinary delinquency में परिवर्तित नहीं हो जाता।
CAT के आदेश में हाईकोर्ट ने किया हस्तक्षेप
अदालत ने पाया कि केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने राजेश कुमार सिंह की ओर से उठाए गए तर्कों को उस दृष्टिकोण से नहीं परखा जिस तरह उन्हें रिकॉर्ड में उपलब्ध संबंधित पत्रों के संदर्भ में परखा जाना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि charge-sheet को सीमित परिस्थितियों में न्यायिक समीक्षा के लिए चुनौती दी जा सकती है, लेकिन यदि charge को पढ़ने मात्र से misconduct का मामला नहीं बनता तो अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है।
पूरी विभागीय कार्रवाई ‘ab initio’ वitiated
फैसले में अदालत ने विभागीय कार्रवाई पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि वर्तमान मामले में disciplinary action की पूरी प्रक्रिया ab initio vitiated थी।
अदालत के अनुसार उपलब्ध परिस्थितियों में अधिकारी ने संगठन के हित में अपने judgment पर भरोसा करते हुए निर्णय लिया था और ऐसा कोई आधार नहीं था जिससे यह माना जाए कि उन्होंने misconduct किया।
चार्जशीट और सभी दंडात्मक कार्यवाहियां रद्द
फैसले के अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि राजेश कुमार सिंह की writ petition स्वीकार की जाती है।
अदालत ने:
- चार्जशीट को रद्द किया।
- विभागीय कार्यवाही को रद्द किया।
- उससे जुड़ी सभी consequential penalty orders/proceedings को quash and set aside किया।
- अधिकारी के सभी संबंधित सेवा लाभ बहाल करने का निर्देश दिया।
12 सप्ताह में बहाल होंगे सेवा और मौद्रिक लाभ
हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि राजेश कुमार सिंह को वे सभी service benefits, जिनके वे विभागीय कार्रवाई शुरू न होने की स्थिति में हकदार होते, बहाल किए जाएं।
इसमें promotion-related और monetary entitlements भी शामिल हैं। अदालत ने इन लाभों को 12 सप्ताह के भीतर बहाल करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने क्या सिद्धांत तय किया?
फैसले का व्यापक संदेश यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों को अपने पद पर रहते हुए परिस्थितियों के अनुरूप bona fide निर्णय लेने का अवसर मिलना चाहिए। अदालत ने हालांकि साथ ही स्पष्ट किया कि यदि किसी अधिकारी की कार्रवाई में malice, जानबूझकर नियम तोड़ने की मंशा या corrupt motive पाया जाता है, तो वह अलग स्थिति होगी और ऐसे मामलों में कार्रवाई की जा सकती है।
इस मामले में हाईकोर्ट का निष्कर्ष रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री पर आधारित है—अदालत को ऐसा कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिला कि राजेश कुमार सिंह को CBI की closure report का विरोध करना था और उपलब्ध रिकॉर्ड से misconduct का आरोप भी स्थापित नहीं हुआ।
राजेश कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वजीत सिंह और अधिवक्ता पुनीत चंद्र की पैरवी के बाद आया यह फैसला विभागीय कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा और प्रशासनिक निर्णय लेने वाले अधिकारियों की जवाबदेही के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। अदालत ने एक तरफ भ्रष्ट मंशा या जानबूझकर नियम उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही को बरकरार रखा, वहीं दूसरी तरफ bona fide प्रशासनिक निर्णय को केवल बाद की असहमति या विभागीय अपेक्षा से अलग होने के आधार पर misconduct मानने से इनकार किया।




