जिस शिया कॉलेज के मोनोग्राम पर लिखा है “अना मदी-नतुल इल्म व अलीय्युन बाबुहा”, उसी दरवाज़े से निकले Justice Vikram Nath अब बनेंगे भारत के अगले CJI

1919 में आका हसन साहब की हुई रोशन हुई इल्म की शमा, एक सदी से ज्यादा बाद उसकी रोशनी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची—शिया पीजी कॉलेज लखनऊ के पूर्व छात्र जस्टिस विक्रम नाथ की ऐतिहासिक यात्रा हज़रत अली अलैहिस्सलाम से मोहब्बत रखने वालों के लिए खुशी का मुकाम—आफताबे शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी ने जस्टिस विक्रम नाथ को भेजी मुबारकबाद और दुआ

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जिस शिया कॉलेज के मोनोग्राम पर लिखा है—“अना मदी-नतुल इल्म व अलीय्युन बाबुहा”, उसी दरवाज़े से निकले Justice Vikram Nath अब बनेंगे भारत के अगले CJI

1919 में आका हसन साहब की हुई रोशन हुई इल्म की शमा, एक सदी से ज्यादा बाद उसकी रोशनी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची—शिया पीजी कॉलेज लखनऊ के पूर्व छात्र जस्टिस विक्रम नाथ की ऐतिहासिक यात्रा

हज़रत अली अलैहिस्सलाम से मोहब्बत रखने वालों के लिए खुशी का मुकाम—आफताबे शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी ने जस्टिस विक्रम नाथ को भेजी मुबारकबाद और दुआ

 

तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव 

लखनऊ।कुछ इबारतें सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं—दिल में उतर जाती हैं।

कुछ दरवाज़े केवल आने-जाने का रास्ता नहीं होते—वे पीढ़ियों के सपनों की चौखट बन जाते हैं।

और कुछ कॉलेज सिर्फ डिग्रियां नहीं देते—वे ऐसे विद्यार्थी तैयार करते हैं, जिनकी कामयाबी एक दिन उसी संस्थान की पहचान बन जाती है।

लखनऊ का शिया पीजी कॉलेज ऐसी ही एक कहानी है।

कॉलेज के मोनोग्राम पर दर्ज है—

“अना मदी-नतुल इल्म व अलीय्युन बाबुहा”

यानी—“मैं इल्म का शहर हूं और अली उसके दरवाज़े हैं।”

आज इस इबारत के सामने खड़े होकर शिया कॉलेज की एक सदी से ज्यादा लंबी तालीमी यात्रा का एक नया अध्याय दिखाई देता है।

इसी संस्थान के पूर्व छात्र जस्टिस विक्रम नाथ अब भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश यानी Chief Justice of India बनने की दहलीज पर हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वर्तमान CJI न्यायमूर्ति सूर्यकांत का कार्यकाल 9 फरवरी 2027 तक है, जबकि जस्टिस विक्रम नाथ का कार्यकाल 23 सितंबर 2027 तक निर्धारित है। मौजूदा वरिष्ठता क्रम में इसी कारण उनके अगले CJI बनने की बात सामने आती है। हालांकि औपचारिक नियुक्ति भविष्य में संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होगी।

1919 में जली थी इल्म की शमा

शिया पीजी कॉलेज की कहानी किसी आधुनिक कैंपस से शुरू नहीं हुई थी।

यह कहानी उस दौर की है जब लखनऊ में शिक्षा को नई दिशा देने का सपना देखा जा रहा था।

1919 में शिया कॉलेज की शैक्षणिक यात्रा आफताब ए शरीयत मौलाना कल्बे जवाद नकवी के खानदान के बुजुर्गो ने इसकी शुरूआत की थी ।

शुरुआती दौर में कक्षाएं आसिफी इमामबाड़े के परिसर में चलीं। बाद में संस्था ने अपना विस्तार किया और सितापुर रोड स्थित परिसर उसकी पहचान बना।

एक सदी से ज्यादा का यह सफर केवल इमारतों का विस्तार नहीं था।

यह इल्म की उस शमा का सफर था, जिसे एक पीढ़ी ने जलाया और दूसरी पीढ़ी ने आगे बढ़ाया।

आज वही संस्था कला, विज्ञान, वाणिज्य, विधि और अन्य क्षेत्रों में शिक्षा प्रदान कर रही है। कॉलेज की आधिकारिक जानकारी में सीतापुर रोड और विक्टोरिया स्ट्रीट परिसरों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं तथा विभिन्न संकायों का उल्लेख है।

इसी चौखट पर कानून की किताब लेकर बैठा था एक विद्यार्थी

समय की किताब पलटती है और कहानी पहुंचती है उस दौर में जब विक्रम नाथ कानून की पढ़ाई कर रहे थे।

शिया पीजी कॉलेज और लखनऊ विश्वविद्यालय से जुड़ी उनकी कानून शिक्षा के बाद 30 मार्च 1987 को उन्होंने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में नामांकन कराया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में उन्होंने 17 वर्ष से अधिक वकालत की।

फिर वही विद्यार्थी न्याय की कुर्सी तक पहुंचा।

24 सितंबर 2004 को वे इलाहाबाद हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश बने।

27 फरवरी 2006 को स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में करीब 15 वर्ष सेवा के बाद 10 सितंबर 2019 को गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने।

और फिर—

31 अगस्त 2021।

जस्टिस विक्रम नाथ ने भारत के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।

इन सभी तारीखों की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक जीवनी से होती है।

गुजरात से सुप्रीम कोर्ट तक—अदालत की कार्यवाही जनता के सामने

गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में जस्टिस विक्रम नाथ ने अदालत की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग की पहल की।

सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक जीवनी इसे न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल और अदालत की कार्यवाही तक जनता की पहुंच बढ़ाने वाली पहल के रूप में दर्ज करती है।

सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने के बाद भी उनकी जिम्मेदारियां बढ़ती गईं।

वे Supreme Court Legal Services Committee के अध्यक्ष रहे।

मई 2025 से वे Supreme Court e-Committee के अध्यक्ष हैं।

24 नवंबर 2025 को उन्होंने National Legal Services Authority यानी NALSA के Executive Chairman का पद संभाला।

वे Mediation and Conciliation Project Committee के अध्यक्ष भी हैं।

इन भूमिकाओं का एक महत्वपूर्ण पक्ष है—न्याय तक पहुंच, कानूनी सहायता और वैकल्पिक विवाद समाधान को मजबूत करना।

जब विद्यार्थी अपनी ही चौखट पर न्यायमूर्ति बनकर लौटा

किसी कॉलेज के लिए इससे ज्यादा भावुक दृश्य क्या होगा कि उसका पुराना विद्यार्थी वर्षों बाद उसी परिसर में लौटे—लेकिन इस बार छात्र बनकर नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बनकर।

2022 में जस्टिस विक्रम नाथ शिया पीजी कॉलेज पहुंचे और हज़रत इमाम मोहम्मद तकी भवन के उद्घाटन से जुड़े कार्यक्रम में शामिल हुए।

जिस जगह कभी उन्होंने विद्यार्थी के रूप में समय बिताया था, वहीं अब उनका स्वागत न्यायमूर्ति के रूप में हुआ।

यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था।

यह जैसे अतीत का वर्तमान से मिलना था।

एक तरफ कॉलेज की पुरानी चौखट।

दूसरी तरफ देश की सर्वोच्च अदालत का न्यायाधीश।

और बीच में चार दशक का लंबा सफर।

वक्त बदल गया था, लेकिन कॉलेज ने अपने विद्यार्थी को पहचान लिया था।

“या अली” की पुकार और इंसाफ का भाव

हज़रत अली अलैहिस्सलाम से मोहब्बत रखने वालों के लिए “या अली” आस्था, हौसले और उम्मीद से जुड़ी एक भावनात्मक पुकार है।

ठोकर लगने पर संभलने की उम्मीद।

मुश्किल में हिम्मत।

और इंसाफ की तलाश।

शिया कॉलेज के मोनोग्राम पर इल्म के शहर और अली के दरवाज़े की इबारत इसी भावभूमि से जुड़ी एक प्रतीकात्मक पहचान है।

आज उसी संस्थान से निकला एक विद्यार्थी भारतीय न्यायपालिका की सबसे ऊंची संवैधानिक जिम्मेदारियों में से एक की ओर बढ़ रहा है।

आस्था अपनी जगह है।

संविधान अपनी जगह।

मगर दोनों के बीच एक शब्द ऐसा है जो हर इंसान के दिल को छूता है—

इंसाफ।

आफताब ए शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी की मुबारकबाद

जस्टिस विक्रम नाथ के CJI बनने की ओर बढ़ते कदम पर भारत की सुप्रीम रिलीजियस अथॉरिटी आफताबे शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी ने भी उन्हें मुबारकबाद दी है।

मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी की ओर से भेजे गए पत्र में जस्टिस विक्रम नाथ को इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर मुबारकबाद और दुआएं पेश की गई हैं।

यह संदेश लखनऊ और शिया पीजी कॉलेज से जुड़ी उस खुशी को और गहरा करता है, जिसमें एक पुराने विद्यार्थी की उपलब्धि को एक पूरी तालीमी विरासत की कामयाबी के रूप में देखा जा रहा है।

इल्म की चौखट से निकला विद्यार्थी जब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचता है, तो खुशी सिर्फ परिवार की नहीं रहती।

वह उस्तादों, सहपाठियों और उस संस्थान की भी खुशी बन जाती है, जिसने कभी उसे पढ़ाया था।

तहलका टुडे का भी इस कहानी से आत्मीय रिश्ता

इस ऐतिहासिक प्रसंग से तहलका टुडे का भी एक छोटा लेकिन आत्मीय रिश्ता जुड़ा है।

तहलका टुडे के एडिटर सैयद रिज़वान मुस्तफा वर्ष 1985 में शिया पीजी कॉलेज के विद्यार्थी रहे।

इसके अगले ही वर्ष 1986 में जस्टिस विक्रम नाथ ने इसी संस्थान से कानून की शिक्षा पूरी की।

चार दशक बाद दोनों की राहें अलग-अलग क्षेत्रों में दिखाई देती हैं।

एक ओर पत्रकारिता की कलम।

दूसरी ओर न्यायपालिका की जिम्मेदारी।

लेकिन दोनों की पुरानी यादों की शुरुआत एक ही जगह से हुई—

शिया पीजी कॉलेज, लखनऊ।

किसी शिक्षण संस्थान की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है कि उसके विद्यार्थी अलग-अलग रास्तों पर जाएं और वर्षों बाद उनकी कामयाबी उसी संस्थान का नाम रोशन करे।

आज का शिया कॉलेज—पुरानी विरासत, नई पीढ़ी

शिया पीजी कॉलेज आज केवल अपने इतिहास के कारण महत्वपूर्ण नहीं है।

कॉलेज की आधिकारिक वेबसाइट पर कला, विज्ञान, वाणिज्य, विधि और अन्य क्षेत्रों में विभिन्न पाठ्यक्रमों और शैक्षणिक सुविधाओं का विवरण उपलब्ध है। कॉलेज लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध पाठ्यक्रम भी संचालित करता है।

यानी 1919 की वह छोटी-सी शैक्षणिक शुरुआत आज एक विस्तृत उच्च शिक्षा व्यवस्था में बदल चुकी है।

लेकिन कॉलेज की असली पहचान उसकी इमारतों से ज्यादा उसके विद्यार्थियों से है।

और जस्टिस विक्रम नाथ की यात्रा उसी पहचान का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

अब 2027 की ओर देख रहा है शिया कॉलेज

सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में वर्तमान CJI न्यायमूर्ति सूर्यकांत की सेवानिवृत्ति की तारीख 9 फरवरी 2027 दर्ज है। उसी रिकॉर्ड में जस्टिस विक्रम नाथ का सेवानिवृत्ति दिवस 23 सितंबर 2027 दिया गया है।

इस वर्तमान वरिष्ठता क्रम के चलते जस्टिस विक्रम नाथ के CJI बनने की संभावना सामने आती है।

अगर संवैधानिक नियुक्ति की प्रक्रिया इसी क्रम में आगे बढ़ती है, तो शिया पीजी कॉलेज के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ जाएगा।

जिस विद्यार्थी ने कभी इसी चौखट पर कानून की किताब खोली थी, वही विद्यार्थी भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका की अगुवाई करेगा।

और तब शायद कॉलेज के मोनोग्राम पर लिखी वह पुरानी इबारत कुछ और गहरी महसूस होगी—

“अना मदी-नतुल इल्म व अलीय्युन बाबुहा।”

इल्म का शहर।
अली का दरवाज़ा।

1919 में जली हुई इल्म की शमा आज भी जल रही है।

उसकी रोशनी ने न जाने कितनी पीढ़ियों के रास्ते रोशन किए।

और अब उसी रोशनी की कहानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच रही है।

**एक किताब से शुरू हुआ सफर

एक कॉलेज की चौखट से निकला …
और मंजिल—इंसाफ की सबसे ऊंची संवैधानिक जिम्मेदारी।**

हज़रत अली अलैहिस्सलाम से मोहब्बत रखने वालों के लिए खुशी का यह मुकाम है, शिया पीजी कॉलेज के लिए गौरव का क्षण है और लखनऊ की तालीमी विरासत के लिए इतिहास का एक खूबसूरत नया पन्ना।

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