Tahalka Today Team
बिलासपुर/रायपुर। शहादत-ए-इमाम हुसैन (अ.) की याद में मनाए जाने वाले मोहर्रम पर्व के बीच छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से अज़ादारों और मोहर्रम समितियों को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड द्वारा जारी उस विवादित आदेश के प्रभाव और संचालन पर रोक लगा दी है, जिसमें मोहर्रम, ताज़िया, उर्स और अन्य धार्मिक आयोजनों में डीजे, ब्रास बैंड, धुमाल, आतिशबाज़ी आदि के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाते हुए उल्लंघन की स्थिति में समितियों को भंग करने और 50 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाने की चेतावनी दी गई थी।
मोहर्रम की आमद के साथ ही यह आदेश प्रदेश भर की मोहर्रम समितियों, ताज़ियादारों और धार्मिक संगठनों में चिंता का विषय बन गया था। कई स्थानों पर इसे सदियों पुरानी स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा था।
इसी के खिलाफ मुंबई में पंजीकृत राष्ट्रीय संस्था सुफी इस्लामिक बोर्ड ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति Shyna Ajay की अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए अंतरिम राहत प्रदान कर दी।
क्या था वक्फ बोर्ड का आदेश?
11 जून 2026 को छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड द्वारा जारी आदेश में प्रदेश भर की धार्मिक समितियों को निर्देश दिया गया था कि मोहर्रम, ताज़िया, उर्स तथा अन्य धार्मिक आयोजनों में डीजे, धुमाल, ब्रास बैंड, आतिशबाज़ी तथा कुछ अन्य गतिविधियों का प्रयोग न किया जाए।
सबसे अधिक विवाद उस प्रावधान को लेकर हुआ जिसमें कहा गया था कि यदि कोई समिति या व्यक्ति इन निर्देशों का उल्लंघन करता पाया गया तो संबंधित समिति को भंग कर दिया जाएगा तथा उसके प्रबंधन पर 50,000 रुपये का आर्थिक दंड लगाया जाएगा।
याचिका में उठाए गए बड़े सवाल
सुफी इस्लामिक बोर्ड ने अपनी याचिका में कहा कि वक्फ बोर्ड का गठन वक्फ संपत्तियों के संरक्षण, प्रशासन और प्रबंधन के लिए किया गया है। वक्फ अधिनियम 1995 कहीं भी बोर्ड को यह अधिकार नहीं देता कि वह धार्मिक परंपराओं, सांस्कृतिक रिवाजों या मोहर्रम की स्थानीय रस्मों पर प्रतिबंध लगाए अथवा समितियों को भंग करने और आर्थिक दंड देने जैसे आदेश जारी करे।
याचिका में यह भी कहा गया कि बिना किसी नोटिस, सुनवाई या वैधानिक जांच के किसी समिति को दंडित करने की चेतावनी संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित प्राकृतिक न्याय और समानता के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
अदालत में क्या हुई बहस?
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता देवेंद्र प्रताप सिंह ने अदालत को बताया कि मोहर्रम की रस्में पहले से चल रही हैं और आशूरा का दिन अत्यंत निकट है। ऐसे समय इस प्रकार का आदेश लागू होने से धार्मिक समुदाय में भ्रम, तनाव और असंतोष की स्थिति पैदा हो सकती है।
उन्होंने तर्क दिया कि वक्फ बोर्ड अपनी वैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर कार्य कर रहा है और यह आदेश न केवल अधिकार क्षेत्र से परे है बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता को भी प्रभावित करता है।
राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता आनंद ददरिया तथा वक्फ बोर्ड की ओर से अधिवक्ता प्रतीक शर्मा उपस्थित हुए।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मोहर्रम का पर्व निकट है और धार्मिक गतिविधियां पहले से जारी हैं। ऐसे समय विवादित आदेश का क्रियान्वयन उन लोगों में असंतोष और अशांति पैदा कर सकता है जो इस पर्व को मना रहे हैं।
इसी आधार पर अदालत ने कहा कि मामले की विस्तृत सुनवाई होने तक विवादित आदेश को लागू नहीं किया जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि:
“11 जून 2026 के विवादित नोटिस का प्रभाव और संचालन अगली सुनवाई तक स्थगित रहेगा।”
साथ ही राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड को जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस जारी कर चार सप्ताह का समय दिया गया है।
मोहर्रम केवल मातम नहीं, एक ऐतिहासिक विरासत
मोहर्रम और ताज़िया केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं, लोक संस्कृतियों और ऐतिहासिक रिवाजों के अनुसार इनकी अपनी विशिष्ट पहचान रही है।
कई स्थानों पर सदियों से ताज़िया जुलूसों के साथ पारंपरिक बैंड, धुमाल, अखाड़े और स्थानीय सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी होती रही हैं। इन्हें लेकर धार्मिक दृष्टिकोण भिन्न हो सकते हैं, लेकिन न्यायालय में मूल प्रश्न यह है कि क्या वक्फ बोर्ड को ऐसे मामलों में दंडात्मक आदेश जारी करने का अधिकार है।
अज़ादारों और समितियों में राहत
हाईकोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद प्रदेश भर की मोहर्रम समितियों और अज़ादारों में राहत का माहौल देखा जा रहा है। कई धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने इसे संवैधानिक अधिकारों तथा धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
अब सबकी निगाहें अगली सुनवाई पर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक नोटिस तक सीमित नहीं है बल्कि वक्फ बोर्डों की वैधानिक शक्तियों की सीमा और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं में हस्तक्षेप के अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न बन सकता है।
मोहर्रम से ठीक पहले आया यह आदेश और फिर उस पर हाईकोर्ट की रोक छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देशभर के धार्मिक एवं कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गई है।
अब सबकी निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि वक्फ बोर्ड द्वारा जारी यह आदेश कानून की कसौटी पर कितना खरा उतरता है।
रिपोर्ट: सैयद रिज़वान मुस्तफा




