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✍ रिपोर्ट: मरियम मुस्तफा 

बाराबंकी की मिट्टी ने एक बार फिर इतिहास को दोहराया है — लेकिन इस बार तलवार नहीं, सेवा और संवेदना से।
यह कहानी है एक ऐसी बेटी की, जो आज भी लोगों के दिलों पर राज कर रही है —
वो हैं भाजपा की प्रदेश महासचिव और बाराबंकी की पूर्व सांसद प्रियंका सिंह रावत, जिन्हें लोग श्रद्धा और सम्मान से “बाराबंकी की महारानी लक्ष्मीबाई” कहते हैं।


🟣 सांसद नहीं, फिर भी हर घर में नाम

वो संसद में नहीं बैठीं, लेकिन जनता के ज़ेहन में आज भी उनकी जगह सबसे ऊपर है।
हर मोहल्ला, हर गली, हर गांव में जब कोई मुश्किल आती है, एक ही नाम लिया जाता है —
“प्रियंका दीदी।”
पद की सीमाएं कभी उनके काम को बाँध नहीं सकीं।
वो आज भी उतनी ही तल्लीन हैं — बस अब भाषण नहीं, खामोश सेवा से लड़ रही हैं।


🟣 सेवा के वो सैकड़ों मोर्चे, जहां प्रियंका रावत बनती हैं फरिश्ता

🔹 प्रधानमंत्री आवास योजना में घर का सपना टूटने से पहले ही वो हाथ बढ़ाती हैं।
🔹 बीमार का इलाज — चाहे कैंसर हो, किडनी, या ऑपरेशन की ज़रूरत — वो अस्पताल तक साथ देती हैं।
🔹 बुजुर्ग की आंखों में जब रोशनी जाती है, तो उनकी टीम ऑपरेशन और इलाज का इंतज़ाम करती है।
🔹 गरीब, विधवा और यतीम — जिनकी कोई सुनवाई नहीं, प्रियंका दीदी उनके लिए आस बनती हैं।
🔹 बेटियों को डॉक्टर, इंजीनियर, एलएलबी बनाना — सिर्फ भाषणों में नहीं, वो फीस भरवाकर ज़मीन पर ये बदलाव कर रही हैं।
🔹 बाढ़ ग्रस्त इलाके — घाघरा के किनारे जब पानी चढ़ता है, तो राशन, दवा, कपड़े, तिरपाल लेकर सबसे पहले पहुंचती हैं — बिना मीडिया को बताए, बिना फोटो खिंचवाए।

“कहीं कोई भूखा है, तो उन्हें पहले से पता होता है — और मदद पहुँच चुकी होती है, इससे पहले कि वो आवाज़ उठाए।”


🟣 महिलाओं और बेटियों की असली रक्षक

प्रियंका सिंह रावत का पूरा जीवन एक मिशन है — “हर बेटी को आगे बढ़ाना, हर महिला को सुरक्षित बनाना।”
थानों से लेकर थ्रेसहोल्ड तक, उन्होंने महिलाओं के लिए न्याय की लड़ाई लड़ी।
सिर्फ मंचों से नहीं, घर-घर जाकर

“अगर बेटी को स्कूल जाना है, और समाज ने रोका — तो दीदी ने बाइक उठाकर खुद स्कूल तक पहुँचाया।”


🟣 पर्यावरण की माँ जैसी चिंता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान में उन्होंने सिर्फ एक पेड़ नहीं लगाया —
उन्होंने ज़िंदगी और संवेदना का पौधा बोया।
उनकी अपील थी:

“माँ की ममता को सलाम करना है, तो एक पेड़ उसके नाम पर लगाना होगा।”


🟣 खामोशियां ही उनकी भाषा हैं

आज जहां नेता सोशल मीडिया पर दिखावे में लगे हैं, प्रियंका रावत बिना प्रचार के परिवर्तन ला रही हैं।
वो गूंजती नहीं — बस असर छोड़ जाती हैं।
जहां-जहां पीड़ा है, वहां-वहां प्रियंका दीदी हैं।

“वो टेलीविजन और सोशल मीडिया पर कम, और बुजुर्ग और गरीब की झोपड़ी में ज़्यादा मिलती हैं।

प्रियंका सिंह रावत सिर्फ एक नाम नहीं, एक उम्मीद हैं।
वो बाराबंकी की वह आत्मा हैं, जो न थकती है, न रुकती है, न दिखावा करती है।
उनकी सेवा में तामझाम नहीं — दुआएं और भरोसा है।

सांसद न होते हुए भी वो “जनता की सांसद” हैं — और रहेंगी।
बाराबंकी को जब फिर नेतृत्व की ज़रूरत होगी, तो जनता एकजुट होकर कहेगी:

“हमें फिर वही दीदी चाहिए — प्रियंका रावत, जो दिल से काम करती हैं।”

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