रिसालतुल हुक़ूक़ : खामोशी में लिखा गया वह संविधान, जो आज भी इंसानियत को ज़िंदा रखे है

“Jab duniya zulm aur be-insafi ke daur se guzar rahi thi, tab Hazrat Imam Sajjad A.S. ne Risalatul Huquq ke zariye insaniyat ka ek aisa naqsha pesh kiya, jo aaj bhi rehnumai karta hai.”

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Tahalka Today | Cover Story | Special

जब तलवारें सच बोलने से रोक दी जाएँ,
जब मिम्बर ख़ामोश कर दिए जाएँ,
जब सच कहना मौत बन जाए —
तब कुछ लोग दुआ, अख़लाक़ और हक़ को हथियार बनाते हैं।

इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम (इमाम सज्जाद) ऐसे ही दौर की पैदाइश थे।
कर्बला के बाद का ज़माना —
जहाँ लाशें ज़मीन पर थीं और ज़मीर क़ैदख़ानों में।

उसी अंधेरे में इमाम सज्जाद ने एक किताब लिखी —
“रिसालतुल हुक़ूक़”
न नारा, न भाषण, न विद्रोह —
बल्कि हक़ का दस्तावेज़,
जो आज 1400 साल बाद भी
संविधान, मानवाधिकार घोषणापत्र और नैतिक गाइडलाइन से आगे खड़ा दिखाई देता है।

यह किताब क्या है ?

क्योंकि यह सत्ता से सवाल नहीं करती थी,
बल्कि इंसान से जवाब माँगती थी

यह नहीं पूछती थी कि
“हुकूमत क्या कर रही है?”
बल्कि पूछती थी —
“तुम अपने हक़ अदा कर रहे हो या नहीं?”

और यही बात हर ज़ालिम को सबसे ज़्यादा डराती है।

अल्लाह का हक़ : जब इंसान ख़ुदा को भूल जाए

रिसालतुल हुक़ूक़ की पहली बुनियाद है —
अल्लाह का हक़

आज का इंसान ख़ुद को मालिक समझ बैठा है।
उसकी इबादत बदल चुकी है —
कोई सत्ता पूजता है,
कोई पैसा,
कोई लाइक्स और फॉलोअर्स।

रिज़ल्ट?
डिप्रेशन, बेचैनी, डर, असंतोष।

इमाम सज्जाद कहते हैं —
जब तक इंसान ऊपर नहीं झुकेगा,
वह अंदर से सीधा नहीं हो सकता।

आज की दुनिया को इबादत नहीं, तवाज़ुन की ज़रूरत है
और वही इस हक़ की असल रूह है।

नफ़्स का हक़ : आज का Mental Health Manifesto

इमाम सज्जाद नफ़्स (स्वयं) के हक़ की बात करते हैं —
उसे गुनाह, ज़ुल्म और अति से बचाने की।

आज के दौर में इसे “पुरानी सोच” कहा जाता है,
लेकिन सच्चाई यह है कि
आज की सबसे बड़ी बीमारी Self-destruction है।

ड्रग्स, अश्लीलता, हिंसा, आत्महत्या —
यह सब आज़ादी नहीं,
अंदर की हार है।

इमाम सज्जाद का पैग़ाम सीधा है:
Self-control ही असली Self-care है।

आज जब दुनिया Mental Health पर अरबों खर्च कर रही है,
वहाँ इमाम सज्जाद 1400 साल पहले
रूह की थेरेपी लिख चुके थे।

ज़बान का हक़ : सोशल मीडिया के दौर में सबसे ज़रूरी उसूल

इमाम कहते हैं —
ज़बान का हक़ है कि उससे ज़ुल्म न हो।

आज ज़बान हाथों में आ गई है —
मोबाइल कीबोर्ड पर।

एक ट्वीट दंगा करा देता है,
एक वीडियो किसी की ज़िंदगी तबाह कर देता है।

हम “Freedom of Speech” कहते हैं,
लेकिन भूल जाते हैं कि
हर आज़ादी ज़िम्मेदारी माँगती है।

रिसालतुल हुक़ूक़ आज कहती है:
बोलो, लेकिन इंसानियत की हद में।

आँख और कान का हक़ : Digital युग की सबसे अनदेखी चेतावनी

आज इंसान जो देख रहा है, वही बन रहा है।
हिंसा, अश्लीलता, अफ़वाह —
सब कुछ “कंटेंट” बन चुका है।

इमाम सज्जाद ने आँख और कान के हक़ को
अमानत कहा।

आज Algorithms हमें नहीं चलाते,
हम Algorithms के गुलाम बन चुके हैं।

यह किताब हमें याद दिलाती है —
हर देखी चीज़ सच नहीं,
हर सुनी बात ज्ञान नहीं।

माता–पिता का हक़ : जब घर सबसे अकेली जगह बन जाए

इमाम सज्जाद माँ के हक़ पर लिखते हैं और कहते हैं —
माँ ने वह सहा जो कोई नहीं सह सकता।

आज Old Age Homes बढ़ रहे हैं,
घर घटते जा रहे हैं।

बच्चे “Busy” हैं,
मगर दिल ख़ाली।

रिसालतुल हुक़ूक़ साफ़ कहती है —
जो अपने माँ-बाप का हक़ नहीं पहचानता,
वह किसी समाज का वफ़ादार नहीं हो सकता।

पड़ोसी का हक़ : ऊँची इमारतों में मरती इंसानियत

आज हम फ्लैट्स में रहते हैं,
लेकिन एक-दूसरे से बेख़बर।

इमाम सज्जाद कहते हैं —
पड़ोसी की ग़ैरहाज़िरी में उसकी हिफ़ाज़त करो।

आज पड़ोसी की चीख़ भी
हमारे दरवाज़े तक नहीं पहुँचती।

यह किताब अकेलेपन के ख़िलाफ़ एलान है।

हाकिम और रैयत : सत्ता के लिए सबसे बड़ा आईना

इमाम सज्जाद ने हाकिम के हक़ की बात की —
लेकिन असल में यह हुक्मरानों के फ़र्ज़ हैं।

आज सत्ता सुविधा बन चुकी है,
अमानत नहीं।

नेता, अफ़सर, सिस्टम —
सब जवाबदेही से भागते हैं।

रिसालतुल हुक़ूक़ का सियासी उसूल:
Power is a trust, not a trophy.

अगर यह किताब संसदों में पढ़ी जाए,
तो क़ानूनों से पहले ज़मीर जागे।

उस्ताद और तालीम : जब शिक्षा कारोबार बन जाए

आज शिक्षा मार्केट है,
उस्ताद सर्विस प्रोवाइडर।

इमाम सज्जाद तालीम को
तज़्किया (चरित्र निर्माण) से जोड़ते हैं।

डिग्री हो सकती है,
लेकिन इंसान नहीं।

रिसालतुल हुक़ूक़ चेतावनी देती है:
अख़लाक़ के बिना शिक्षा —
सभ्य दरिंदगी है।

यह किताब क्यों आज भी ज़रूरी है?

क्योंकि यह किसी मज़हब तक सीमित नहीं,
यह इंसानियत का चार्टर है।

  • UN Charter से पहले Human Rights
  • संविधान से पहले Moral Constitution
  • AI युग में भी इंसान होने की परिभाषा

यह किताब बताती है कि
अगर हर इंसान अपना फ़र्ज़ निभा ले,
तो ज़ुल्म अपने आप हार जाएगा।

Tahalka Today का सवाल

आज जब दुनिया युद्ध, नफ़रत और लालच से थक चुकी है,
क्या हम उस किताब को पढ़ने को तैयार हैं
जो हथियार नहीं,
हक़ की ज़िम्मेदारी सिखाती है?

रिसालतुल हुक़ूक़
कोई पुरानी किताब नहीं —
यह आने वाले कल की ज़रूरत है।

क्योंकि जब इंसान अपने हक़ याद रखने लगे,
तो ज़ालिमों को याद दिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

 

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