तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
नई दिल्ली। ईरान के रहबर-ए-मोअज़्ज़म Ayatollah Ali Khamenei (रहमतुल्लाहि अलैह) की शहादत के बाद मुकल्लिदीन के दरमियान उठ रहे अहम शरई सवालों पर भारत से एक स्पष्ट और आधिकारिक बयान जारी किया गया है। नई दिल्ली स्थित The Office of the Iran’s Supreme Leader’s Representative in India ने औपचारिक पत्र जारी कर तक़लीद से जुड़े मसले पर विस्तृत दिशा-निर्देश प्रदान किए हैं।
जारी बयान की शुरुआत “इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन” से की गई है। पत्र में आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनई (रह.) की मज़लूमाना और जानसोज़ शहादत पर गहरे रंजो-ग़म का इज़हार करते हुए तमाम मोमिनीन की ख़िदमत में ताज़ियत और तसलियत पेश की गई है।
क्या है शरई वज़ाहत?
आधिकारिक बयान में दो अहम बिंदुओं को साफ़ तौर पर वाज़ेह किया गया है:
- जो मुकल्लफ़ीन पहले से आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनई (रह.) की तक़लीद करते आ रहे थे, वे मौजूदा ज़िंदा आलम मरजा-ए-तक़लीद की इजाज़त से अपनी तक़लीद जारी रख सकते हैं।
- लेकिन जो अफ़राद अब बालिग़ हो रहे हैं या नई तक़लीद का इरादा रखते हैं, उनके लिए अनिवार्य है कि वे किसी ज़िंदा मरजा-ए-तक़लीद की पैरवी करें।
इस तरह दफ़्तर ने शरई उसूलों के मुताबिक़ पुराने मुकल्लफ़ीन और नए बालिग़ अफ़राद के लिए अलग-अलग हुक्म स्पष्ट कर दिया है।
दीनी हल्क़ों में क्यों है अहम?
रहबर-ए-मोअज़्ज़म की शहादत के बाद सबसे बड़ा फ़िक़्ही सवाल यही उठ रहा था कि क्या मरहूम मरजा की तक़लीद जारी रह सकती है। इस आधिकारिक एलान ने इस बहस को एक निर्णायक दिशा दे दी है। उलमा और दीनदार तबक़े के बीच इसे एक महत्वपूर्ण शरई रहनुमाई के तौर पर देखा जा रहा है।
नई दिल्ली के 18, तिलक मार्ग स्थित दफ़्तर से जारी इस पत्र पर नुमाइंदगी वली फ़क़ीह हिन्द की ओर से हस्ताक्षर भी दर्ज हैं, जिससे इसकी आधिकारिक हैसियत और अधिक स्पष्ट हो जाती है।
उम्मत के लिए स्पष्ट संदेश
ग़म के माहौल में जारी यह बयान महज़ एक सूचना नहीं, बल्कि दीनि व्यवस्था की निरंतरता का संकेत है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि तक़लीद का निज़ाम शरई क़वायद के तहत जारी रहेगा और नई पीढ़ी के लिए ज़िंदा मरजा की पैरवी आवश्यक होगी।
इस प्रकार शहादत-ए-रहबर के बाद उठे अहम फ़िक़्ही सवालों पर भारत से जारी यह आधिकारिक एलान मुकल्लिदीन के लिए एक ठोस और स्पष्ट मार्गदर्शन बनकर सामने आया है।





