तहलका टुडे टीम/तकी हसनैन
लखनऊ। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में गर्भावस्था और प्रसव के दौरान होने वाली मातृ मौतों को अब केवल आंकड़ों में दर्ज कर आगे बढ़ जाने का दौर खत्म करने की तैयारी है। शासन ने तय किया है कि किसी भी प्रसूता की मौत के 24 घंटे के भीतर उसका ऑडिट होगा। मौत की वजह सामने लाई जाएगी और यदि किसी जनपद में लगातार ऐसे मामले मिलते हैं तो वहां स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधारवादी कदमों के साथ विशेष फोकस किया जाएगा।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि जहां अब तक मातृ मृत्यु के मामलों का ऑडिट सप्ताह में एक बार किया जाता था, वहीं अब दैनिक स्तर पर समीक्षा के निर्देश दिए गए हैं।
अपर मुख्य सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अमित कुमार घोष ने बुधवार को किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के कलाम सेंटर में आरआरटीसी कार्यक्रम के दस वर्ष पूरे होने पर आयोजित समीक्षा कार्यशाला में यह निर्देश दिए।
सवाल सिर्फ मौत का नहीं, मौत की वजह का है
मातृ मृत्यु दर में कमी को स्वास्थ्य विभाग उपलब्धि के रूप में देख रहा है, लेकिन एसीएस का संदेश साफ है—एक भी प्रसूता की मौत को सामान्य आंकड़ा मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।
अमित कुमार घोष ने कहा कि प्रदेश में मातृ मृत्यु दर निश्चित रूप से घटी है, लेकिन गर्भावस्था अथवा प्रसव के दौरान होने वाली प्रत्येक मौत दुखद है। इसलिए जहां मौत हो, वहां कारण की तह तक जाना जरूरी है।
उन्होंने निर्देश दिया कि प्रदेश के किसी भी हिस्से में प्रसूता की मृत्यु होने पर 24 घंटे के भीतर ऑडिट किया जाए। यदि किसी जनपद में बार-बार मातृ मृत्यु के मामले सामने आते हैं तो उस जिले को चिन्हित कर वहां विशेष रूप से काम किया जाए।
यानी अब सवाल केवल यह नहीं होगा कि कितनी मौतें हुईं, बल्कि यह भी पूछा जाएगा कि—
मौत क्यों हुई? कहां इलाज में देरी हुई? रेफरल में कितना समय लगा? हाई रिस्क प्रेगनेंसी की पहचान समय पर हुई या नहीं? और क्या उस मौत को रोका जा सकता था?
197 से 154 तक पहुंचा MMR, लेकिन मंजिल अभी दूर
आरआरटीसी कार्यक्रम की दस साल की यात्रा के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश में मातृ मृत्यु अनुपात यानी MMR 197 प्रति एक लाख जीवित जन्म था। वर्ष 2026 में यह घटकर 154 रह गया है।
अर्थात एक दशक में लगभग 25 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
लेकिन स्वास्थ्य विभाग के लिए यह आंकड़ा राहत के साथ चुनौती भी है। क्योंकि मातृ मृत्यु दर घटने के बावजूद बड़ी संख्या में महिलाओं की जान अभी भी गर्भावस्था, प्रसव अथवा प्रसवोत्तर जटिलताओं के कारण जा रही है।
1791 डॉक्टरों को ट्रेनिंग—अब हाई रिस्क केस से भागना नहीं
मातृ मृत्यु रोकने की रणनीति में Regional Resource Training Centre (RRТC) कार्यक्रम को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आरआरटीसी के तहत अब तक 1791 चिकित्सकों को ट्रेनिंग और कार्यस्थल पर मेंटरिंग दी जा चुकी है। प्रशिक्षण का मकसद डॉक्टरों को आपात स्थिति में तुरंत निर्णय लेने और जटिल मामलों को संभालने में सक्षम बनाना है।
इसका एक बड़ा असर यह बताया जा रहा है कि डॉक्टर अब हाई रिस्क प्रेगनेंसी के मामलों को केवल बड़े केंद्रों पर रेफर करने के बजाय स्वयं संभालने की क्षमता विकसित कर रहे हैं।
PPH पर बढ़ी पकड़—20-25% से 75% तक पहचान
गेट्स फाउंडेशन के उपनिदेशक डॉ. देवेंद्र खंडैत के अनुसार दस वर्ष पहले प्रदेश में पोस्टपार्टम हैमरेज यानी प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव के केवल 20-25 प्रतिशत मामले ही चिन्हित हो पाते थे।
अब यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 75 प्रतिशत हो गया है और ऐसे मामलों में मौके पर ही उपचार शुरू किया जा रहा है।
यही वह बिंदु है जहां ट्रेनिंग और वास्तविक जीवन में मरीज की जान बचाने के बीच सीधा संबंध दिखाई देता है।
डमी पर इमरजेंसी की रिहर्सल, असली मरीज के समय फैसला तेज
आरआरटीसी ट्रेनिंग में केवल किताबों और लेक्चर पर जोर नहीं दिया जाता। डॉक्टरों को डमी के माध्यम से आपात परिस्थितियों का अभ्यास कराया जाता है।
कार्यक्रम की नोडल अधिकारी डॉ. सीमा टंडन के अनुसार प्रशिक्षण में डॉक्टरों को यह अभ्यास कराया जाता है कि इमरजेंसी केस आने पर किस क्रम में और कितनी तेजी से कदम उठाने हैं।
यानी असली इमरजेंसी आने से पहले डॉक्टरों को इमरजेंसी की रिहर्सल कराई जाती है।
स्वास्थ्य व्यवस्था में इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि प्रसव संबंधी कई जटिलताओं में शुरुआती कुछ मिनट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
28 नए स्वायत्त मेडिकल कॉलेज भी रडार पर
अपर मुख्य सचिव ने प्रदेश के 28 नवनिर्मित स्वायत्त मेडिकल कॉलेजों तथा सभी जिला महिला अस्पतालों के डॉक्टरों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए हैं।
इससे संकेत साफ है कि आरआरटीसी मॉडल को केवल चुनिंदा मेडिकल कॉलेजों तक सीमित रखने के बजाय इसका दायरा और व्यापक किया जा रहा है।
अब चुनौती यह होगी कि प्रशिक्षण के बाद उसका असर अस्पतालों में वास्तव में कितना दिखाई देता है।
केजीएमयू का मॉडल नैरोबी तक पहुंचा
केजीएमयू की कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद ने आरआरटीसी टीम को कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन पर बधाई दी।
उन्होंने बताया कि नैरोबी में जब उन्होंने उत्तर प्रदेश के आरआरटीसी मॉडल को प्रस्तुत किया तो वहां मौजूद लोग इस मॉडल को देखकर आश्चर्यचकित थे।
उन्होंने नवजातों के उपचार में CPAP मशीन के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया। जन्म के तुरंत बाद सांस लेने में परेशानी वाले नवजातों के लिए CPAP प्रशिक्षण को उपयोगी बताते हुए उन्होंने कहा कि बाल रोग विशेषज्ञों को इसके बारे में प्रशिक्षित किए जाने से अनेक नवजातों की जान बचाने में मदद मिली।
20 मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों ने साझा किए अनुभव
समीक्षा कार्यशाला में प्रदेश के 20 मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों ने हिस्सा लिया और आरआरटीसी ट्रेनिंग से मिले अनुभव साझा किए।
केजीएमयू की स्त्री रोग विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम की मेंटर डॉ. अंजू अग्रवाल ने बताया कि प्रदेश के 20 मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया जा चुका है और इसके परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं।
कार्यशाला में डीजी परिवार कल्याण डॉ. शुभ्रा मिश्रा, डीजी प्रशिक्षण डॉ. रंजना खरे, केजीएमयू की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. विनीता दास, बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. एसएन सिंह, प्रोफेसर शालिनी त्रिपाठी तथा वीरांगना अवंती बाई अस्पताल के डॉ. सलमान खान सहित अन्य विशेषज्ञों ने भी अपने अनुभव साझा किए।
तहलका टुडे की पड़ताल: असली परीक्षा अब शुरू
कागज पर आंकड़े सुधरे हैं। डॉक्टरों की ट्रेनिंग हुई है। हाई रिस्क प्रेगनेंसी की पहचान बढ़ी है। पोस्टपार्टम हैमरेज के मामलों की पहचान भी पहले से बेहतर हुई है।
लेकिन अब असली सवाल यह है कि 24 घंटे के भीतर होने वाला मातृ मृत्यु ऑडिट सिर्फ रिपोर्ट बनाने की प्रक्रिया बनकर रह जाएगा या उससे अस्पताल की कमियां भी वास्तव में दूर होंगी?
यदि किसी महिला की मौत रेफरल में देरी से हुई, तो जिम्मेदारी तय होगी या नहीं?
यदि हाई रिस्क प्रेगनेंसी समय रहते चिन्हित नहीं हुई, तो कारण सामने आएगा या नहीं?
यदि किसी जिले में लगातार मातृ मौतें हो रही हैं, तो केवल समीक्षा बैठक होगी या डॉक्टरों, संसाधनों और रेफरल सिस्टम में वास्तविक बदलाव भी किया जाएगा?
यही वह फर्क होगा जो मातृ मृत्यु के आंकड़ों को घटाने और वास्तव में माताओं की जान बचाने के बीच दिखाई देगा।
उत्तर प्रदेश ने अब लक्ष्य सिर्फ MMR कम करने का नहीं, बल्कि हर मातृ मृत्यु से सबक लेकर अगली मौत रोकने का तय किया है।
तहलका टुडे की नजर अब इसी पर रहेगी— 24 घंटे का ऑडिट कितनी मौतों की असली वजह सामने लाता है और उन वजहों पर कार्रवाई कितनी होती है।




