“बेटी हो तो ज़हरा जैसी…” ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान के लिए रहमत बनीं बेटी ज़हरा, भारत आईं तो दिखा एक नया अंदाज़

Zahra Pezeshkian, daughter of Iranian President Masoud Pezeshkian, visits India during BRICS 2026, highlighting family, culture and India-Iran friendship.

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सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
तहलका टुडे
ख़बर सिर्फ़ ख़बर नहीं—ख़बर के पीछे छुपी इंसानी कहानी भी है।

कभी-कभी तारीख़ के बड़े-बड़े वाक़ियात के बीच एक छोटी-सी तस्वीर ठहर जाती है। ऐसी तस्वीर, जिसे शायद अख़बार की बड़ी सुर्ख़ियों में जगह न मिले, लेकिन जो देखने वाले के दिल में गहरी उतर जाती है।

एक तरफ़ एक मुल्क का सदर—जिसके चारों तरफ़ सियासत, जंग, ख़तरे और फ़ैसलों का भारी बोझ है।

और उसके क़रीब एक बेटी।

न कोई सरकारी ओहदा।

न सत्ता की कुर्सी।

न किसी इख़्तियार का दावा।

सिर्फ़ एक रिश्ता—

 

बेटी और वालिद का।

यही रिश्ता ज़हरा पेज़ेशकियान को दूसरे सियासी चेहरों से अलग बनाता है।

मसूद पेज़ेशकियान की सियासी ज़िंदगी के उस अहम मोड़ पर, जब वह ईरानी अवाम का भरोसा हासिल करने के लिए इंतिख़ाबी मैदान में उतरे, ज़हरा उनके साथ चलती रहीं। जलसों में, इंतिख़ाबी मुहिम में और लोगों के दरमियान—वह अपने वालिद के साथ दिखाई देती रहीं।

लोगों ने सामने एक सियासतदान देखा।

लेकिन ज़हरा की मौजूदगी ने शायद उस सियासतदान के पीछे छुपे हुए एक बाप को भी लोगों के सामने ला दिया।

और यहीं से कहानी ने एक नया रंग इख़्तियार किया।

सियासत अक्सर किसी रहनुमा को सख़्त, बा-इख़्तियार और फ़ैसला करने वाले चेहरे में बदल देती है। मगर कभी-कभी एक बेटी उस चेहरे के पीछे मौजूद इंसान को सामने ले आती है।

शायद ज़हरा ने भी यही किया।

उन्होंने अपने वालिद की सियासी तस्वीर में मोहब्बत और इंसानियत का रंग भर दिया।

यह कहना दुरुस्त नहीं होगा कि ज़हरा ने अकेले मसूद पेज़ेशकियान को सदर बनाया। ईरानी अवाम ने अपने वोट से अपना राष्ट्रपति चुना। लेकिन यह भी हक़ीक़त है कि ज़हरा की लगातार मौजूदगी ने उनके वालिद की सार्वजनिक छवि को एक नरम, क़रीबी और इंसानी रंग दिया।

और शायद इसी लिए—

वह सिर्फ़ बेटी नहीं रहीं… बिटिया बन गईं बरकत।

जब एक मुल्क जंग के साये में हो

ईरान की कहानी आज आसान कहानी नहीं है।

अमेरिका और इज़राइल के साथ तनाव, जंग का ख़तरा, लगातार सुरक्षा की फ़िक्र और ऐसा बेचैन इलाक़ा जहाँ सुबह की ख़बर शाम तक बदल सकती है—इन सबके दरमियान मसूद पेज़ेशकियान का हर क़दम भारी ज़िम्मेदारी लेकर चलता है।

एक सदर जब अपने मुल्क के लिए फ़ैसला करता है, तो उसके पीछे करोड़ों लोगों की उम्मीदें होती हैं।

लेकिन जब वही सदर घर लौटता है, तो तमाम ओहदे और तमाम अलक़ाब दरवाज़े के बाहर रह जाते हैं।

वहाँ वह सिर्फ़ एक वालिद होता है।

और शायद अपनी बेटी के लिए हमेशा से सिर्फ़ एक वालिद ही रहा है।

इसीलिए ज़हरा की मौजूदगी में एक ख़ामोश ताक़त महसूस होती है।

उन्हें यह कहने की ज़रूरत नहीं कि वह अपने वालिद की ताक़त हैं।

कभी-कभी एक तस्वीर वह बात कह देती है, जिसे सैकड़ों अल्फ़ाज़ भी बयान नहीं कर पाते।

जब धूप के दिनों में भी कोई साया आपके साथ चलता रहे, तो उस साये का नाम रिश्ता होता है।

दिल्ली में एक नया बाब

अब ज़हरा पेज़ेशकियान की हिंदुस्तान आमद ने इस कहानी में एक नया बाब खोल दिया है।

BRICS 2026 के मौक़े पर दिल्ली में जंग के नारों की जगह तहज़ीब के रंग दिखाई दिए।

BRICS बाज़ार में मुख़्तलिफ़ मुल्कों की कला, दस्तकारी और सांस्कृतिक विरासत अपने-अपने रंगों में सजी हुई थी।

ज़हरा अपने शौहर हसन मजीदी के साथ वहाँ पहुँचीं और केंद्रीय वज़ीरे महिला एवं बाल विकास अन्नपूर्णा देवी के साथ बाज़ार का दौरा किया।

भारतीय पवेलियन में हिंदुस्तानी कला और दस्तकारी को देखती हुई ज़हरा की तस्वीर अपने आप में एक पैग़ाम बन गई।

ईरान की बेटी।

हिंदुस्तान की सरज़मीन।

दो क़दीम तहज़ीबें।

और दरमियान में एक ऐसी मुलाक़ात, जिसमें सियासत से ज़्यादा इंसानियत दिखाई देती है।

ईरान और हिंदुस्तान के रिश्ते सिर्फ़ हुकूमती बयानात तक महदूद नहीं रहे। इन रिश्तों की जड़ें शायरी, अदब, ज़बान, सूफ़ियाना रिवायतों और सदियों पुरानी तहज़ीबी आवाजाही में गहरी हैं।

शायद इसी लिए दिल्ली में ज़हरा की मौजूदगी महज़ एक विदेशी मेहमान की मौजूदगी नहीं लगती।

वह जैसे एक क़दीम तहज़ीब से दूसरी क़दीम तहज़ीब की तरफ़ बढ़ता हुआ एक ख़ूबसूरत क़दम हैं।

हिंदुस्तान की बेटियों के नाम एक पैग़ाम

ज़हरा पेज़ेशकियान की कहानी में हिंदुस्तान की बेटियों के लिए भी एक ख़ामोश मगर गहरा पैग़ाम छुपा है।

बेटी को सिर्फ़ घर की चारदीवारी में मत तलाशिए।

उसकी सलाहियत को पहचानिए।

उसके एतमाद को समझिए।

उसे अपने ख़्वाबों के साथ आगे बढ़ने दीजिए।

क्योंकि जब बेटी तालीम हासिल करती है, तो वह सिर्फ़ अपना मुस्तक़बिल नहीं बनाती।

जब आगे बढ़ती है, तो सिर्फ़ अपना नाम रोशन नहीं करती।

और जब मुश्किल वक़्त में अपने वालिद के साथ खड़ी होती है, तो कभी-कभी पूरे ख़ानदान की तस्वीर बदल देती है।

शायद ज़हरा ने भी यही किया।

वह ऐसे वालिद के साथ खड़ी रहीं, जिसके सामने पूरे मुल्क की सियासत थी।

और लोगों ने उस सियासत के पीछे एक बेटी का चेहरा देखा।

शायद इसी चेहरे ने मसूद पेज़ेशकियान को अवाम के और क़रीब ला दिया।

क्योंकि अवाम को सिर्फ़ हाकिम नहीं चाहिए।

उन्हें इंसान चाहिए।

और कभी-कभी सत्ता के पीछे छुपे उस इंसान को देखने के लिए—

एक बेटी ही काफ़ी होती है।

ज़हरा पेज़ेशकियान की कहानी अभी मुकम्मल नहीं हुई है।

आने वाले दिनों में ईरान की सार्वजनिक और सामाजिक ज़िंदगी में वह किस हैसियत से सामने आएँगी, यह वक़्त तय करेगा।

लेकिन आज उनकी सबसे ख़ूबसूरत पहचान यही है कि वह अपने वालिद के साथ खड़ी एक बेटी हैं।

वह बेटी जिसने शोहरत नहीं माँगी।

ओहदा नहीं माँगा।

इख़्तियार नहीं माँगा।

सिर्फ़ अपने वालिद का साथ दिया।

और कभी-कभी दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त यही होती है—

किसी के साथ खड़े रहना।

इसलिए ज़हरा पेज़ेशकियान की तस्वीर को सिर्फ़ एक राष्ट्रपति की बेटी की तस्वीर समझकर आगे मत बढ़ जाइए।

इसमें एक वालिद का एतमाद है।

एक बेटी की मोहब्बत है।

एक मुल्क की बेचैनी है।

एक तहज़ीब की नर्मी है।

और आने वाली नस्लों के लिए एक सवाल भी—

हम अपनी बेटियों को कितना बड़ा आसमान देने के लिए तैयार हैं?

क्योंकि जिस दिन बेटी को आसमान मिल जाता है,

वह सिर्फ़ परवाज़ नहीं करती—

अपने घर की तक़दीर भी बदल सकती है।

और शायद इसी लिए…

“बेटी हो तो ज़हरा जैसी…”

वालिद के लिए रहमत, घर के लिए बरकत।

 

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