तहलका टुडे टीम
लखनऊ। कर्बला के मैदान में 7 मोहर्रम को फ़ुरात का पानी बंद कर दिया गया था। यह वाक़िआ आज भी इंसानियत को अमानत, इंसाफ़ और सब्र का सबक देता है। लेकिन उत्तर प्रदेश में इस बार मोहर्रम के दौरान एक ऐसा मामला सामने आ रहा है जिसने सैकड़ों मुतवल्लियों और इमामबाड़ों के ज़िम्मेदारों के दिलों में बेचैनी पैदा कर दी है।
इल्ज़ाम है कि मोहर्रम की अज़ादारी और रसूमात के लिए बरसों पहले उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड में अमानत के तौर पर जमा कराई गई रक़म मोहर्रम खर्च के नाम पर हर साल मुतअल्लिक़ा लोगों को हर साल मिलती थी आज तक नहीं मिली।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आशूरा-ए-मुहर्रम कल है, लेकिन जिन रक़मों से मजालिस, तबर्रुक, ताज़ियादारी और दूसरी रसूमात अदा होनी थीं, वही अमानत आज भी पहुँच से दूर बताई जा रही है।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि प्रशासनिक अफ़सर और एकाउंटेंट की मिली भगत , लापरवाही या बदइंतज़ामी के चलते इमाम (अ.स.) की अमानत तक रोक ली गई।
आख़िर अपनी ही जमा अमानत का लेने के लिए मुतवल्ली जाएँ तो जाएँ कहाँ?
अमानत थी… एहसान नहीं
प्रदेश के मुख़्तलिफ़ ज़िलों के इमामबाड़ों, अंजुमनों और मुतवल्लियों ने मोहर्रम की अज़ादारी के लिए वक्फ बोर्ड के कहने पर बैंक खाते खुलवाए, पासबुक हासिल कीं और अमानती रक़म जमा कराई।
बताया जाता है कि इन जमाओं पर मिलने वाले मुनाफ़े (ब्याज) से हर साल मोहर्रम की रसूमात पूरी की जाती थीं।
लेकिन आज वही लोग अपनी मोहर्रम के लिए जमा पूंजी के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
उनका कहना है कि यह किसी की ख़ैरात नहीं, बल्कि उनकी अपनी अमानत है।
पासबुक मौजूद… मगर हिसाब कहाँ है?
कई मुतवल्लियों का दावा है पासबुक, बैंक खाते और जमा के दस्तावेज़ वक़्फ़ बोर्ड ने जमा करवा लिए जो उनके पास मौजूद हैं।
इसके बावजूद न उन्हें अपनी जमा रक़म का न पूरा हिसाब मिल रहा है और न यह बताया जा रहा है कि उनकी अमानत की मौजूदा हैसियत क्या है।
सवाल उठ रहे हैं—
- अमानती रक़म कहाँ है?
- उस पर मिलने वाले मुनाफ़े का हिसाब क्या है?
- अगर रक़म मौजूद है तो अदा क्यों नहीं की जा रही?
- अगर नहीं है तो उसकी ज़िम्मेदारी किस पर है?
मोहर्रम में भी इंतज़ार की अज़ादारी
प्रदेश के कई छोटे इमामबाड़ों में इस बार भी मजालिस और तबर्रुक सीमित वसाइल में कराए जा रहे हैं।
कहीं चंदे से इंतज़ाम हो रहा है, कहीं लोग अपनी जेब से खर्च कर रहे हैं।
मुतवल्लियों का कहना है कि अगर उनकी अमानत समय से मिल जाती तो किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत न आती।
आज उनके हाथों में अलम है…
आँखों में आँसू हैं…
और दिल में सिर्फ़ एक सवाल—
“क्या हमारी अपनी अमानत हमें कभी वापस मिलेगी?”
मुख्यमंत्री से कार्रवाई की मांग
धार्मिक और समाजी हलकों से मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश से मांग की जा रही है कि—
- तमाम अमानती खातों का स्पेशल ऑडिट कराया जाए।
- हर जमाकर्ता का पूरा हिसाब सार्वजनिक किया जाए।
- लंबित अदायगियाँ फ़ौरन जारी की जाएँ।
- अगर किसी स्तर पर माली गड़बड़ी हुई है तो ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाए।
- वक्फ की अमानतों की हिफ़ाज़त सुनिश्चित की जाए।
कर्बला का पैग़ाम और आज का सवाल
कर्बला हमें सिखाती है कि अमानत की हिफ़ाज़त ईमान का हिस्सा है।
इमाम हुसैन (अ.स.) ने हक़, इंसाफ़ और अमानत की रक्षा के लिए अपनी और अपने अहलेबैत की कुर्बानी पेश की।
आज उसी मोहर्रम में सैकड़ों मुतवल्ली और इमामबाड़े अपनी ही जमा अमानत के लिए परेशान हैं।
उनके हाथों में अलम है…
लबों पर “या हुसैन (अ.स.)” है…
और आँखों में सिर्फ़ एक दुआ—
“या इमाम हुसैन (अ.स.), आपकी अज़ादारी के लिए जो अमानत जमा की थी, वह हमें कब वापस मिलेगी?”




