रिपोर्ट: सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव
लखनऊ। वक्फ बोर्ड से जुड़ा विवाद अब केवल एक चार्जशीट तक सीमित नहीं रहा। दो अलग-अलग न्यायालयों में विरचित आरोपों के दस्तावेज सामने आने के बाद यह सवाल और तेज हो गया है कि — आखिर किस आधार पर संबंधित प्रशासनिक अधिकारी को जिम्मेदारियाँ दी गईं और सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवा विस्तार मिला?
⚖️ स्पष्ट रहे: दोनों मामलों में आरोप फ्रेम हुए हैं
📂 पहली चार्जशीट: सत्र न्यायालय का मामला
अपर सत्र न्यायाधीश, कक्ष सं० 14, लखनऊ में विचाराधीन एस०टी० 1322/2020 (अपराध सं० 272/2011, थाना सआदतगंज) में भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं — 147, 148, 149, 307, 504, 506, 120B — के तहत आरोप विरचित किए गए।
आरोपों में दरगाह परिसर में कथित हिंसा, फायरिंग और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर बिंदु शामिल हैं।
📂 दूसरी चार्जशीट: मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट
दाण्डिक याद संख्या 5088/12 (थाना हजरतगंज) में भी धारा 147, 353, 504, 506 के तहत आरोप तय हुए — जिनमें लोक सेवक पर हमला और धमकी जैसे आरोप शामिल हैं।
दो अलग-अलग न्यायालयों में आरोप विरचित होना अपने आप में प्रशासनिक समीक्षा का विषय बन गया है।
🔥 बड़ा प्रश्न: चार्जशीट के बाद भी जिम्मेदारी और एक्सटेंशन?
सूत्रों के अनुसार:
- चार्जशीट के बाद भी प्रशासनिक जिम्मेदारी दी गई
- सेवानिवृत्ति के बाद एक वर्ष का सेवा विस्तार मिला
- एक अवधि में वेतन विवाद (लगभग 40 माह) की चर्चा भी रही
अब सवाल उठ रहा है:
- क्या सेवा विस्तार से पहले लंबित मामलों की समीक्षा की गई?
- क्या बोर्ड की बैठक में इस पर औपचारिक चर्चा हुई?
- क्या शासन से विधिवत अनुमोदन प्राप्त हुआ?
🏛 चेयरमैन की क्या मजबूरी?
वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अली जैदी की भूमिका को लेकर अब सार्वजनिक चर्चा तेज है। आलोचकों का प्रश्न है:
- जब प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ “जीरो टॉलरेंस” नीति पर जोर देते हैं,
- जब भूमाफियाओं और भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई की बात होती है,
तो ऐसे में विवादित मामलों से जुड़े अधिकारी पर नरमी क्यों?
क्या यह केवल प्रशासनिक निर्णय था?
या बोर्ड के भीतर कोई ऐसी परिस्थितियाँ थीं जिनके कारण यह निर्णय लिया गया?
हालांकि, चेयरमैन का आधिकारिक पक्ष अभी सामने नहीं आया है।
📢 मुख्यमंत्री की नीति बनाम बोर्ड का निर्णय?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की घोषित नीति भ्रष्टाचार और अपराध के विरुद्ध कठोर रुख की रही है।
ऐसे में यदि आरोपों के बावजूद सेवा विस्तार दिया गया, तो यह आवश्यक है कि:
- शासन स्तर पर इस प्रक्रिया की समीक्षा हो
- नियमों के अनुपालन की जांच हो
- पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए
⚖️ कानून की स्थिति
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि:
- आरोप तय होना दोष सिद्धि नहीं है
- अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा दिया जाएगा
- जब तक दोष सिद्ध न हो, कोई व्यक्ति कानूनी रूप से दोषी नहीं माना जाता
लेकिन सार्वजनिक पदों पर पारदर्शिता और प्रक्रिया की शुचिता अलग प्रश्न हैं।
🧭सवालों के जवाब दस्तावेज़ों से ही आएंगे
दो चार्जशीट, प्रशासनिक जिम्मेदारी, सेवा विस्तार, वेतन विवाद — यह पूरा घटनाक्रम अब सार्वजनिक विमर्श का विषय बन चुका है।
यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है, तो उसे दस्तावेज़ों के माध्यम से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
यदि कहीं प्रक्रिया में चूक हुई है, तो उसकी निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।
🔔 एपिसोड–3 में: औकाफ डिलीशन, धारा 52 की लंबित फाइलें और न्यायालयी पैरवी पर दस्तावेज़ी पड़ताल। जुड़े रहिए।





