तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव
लखनऊ, 26 सितंबर 2026।
उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की 26 सितंबर 2026 को इंदिरा भवन, लखनऊ में हुई बैठक अब उसके फैसलों से ज्यादा बैठक की वैधानिक प्रक्रिया को लेकर चर्चा में है।
बोर्ड की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार अध्यक्ष अली जैदी और सदस्य अधिवक्ता शबाहत हुसैन बैठक में व्यक्तिगत रूप से मौजूद थे, जबकि पूर्व सांसद बेगम नूर बानो और डॉ. नूरूस हसन नकवी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े। बोर्ड ने दावा किया कि विभिन्न जिलों से आए मामलों की सुनवाई की गई और प्रस्तावों पर चर्चा के बाद बहुमत से निर्णय लिए गए।
यहीं से सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल खड़ा होता है—
क्या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़े दो सदस्य कानून की नजर में बैठक में “उपस्थित” माने गए?
कानून क्या कहता है?
वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 17(1) कहती है कि बोर्ड अपने कामकाज के लिए उन समय और स्थानों पर बैठक करेगा, जो regulations में निर्धारित हों। धारा 17(3) के अनुसार बोर्ड के समक्ष आने वाले प्रश्नों का निर्णय बैठक में उपस्थित सदस्यों के बहुमत से किया जाता है।
2025 के वक्फ संशोधन ने धारा 17 में यह जोड़ा कि बोर्ड कम-से-कम प्रत्येक महीने एक बार बैठक करेगा। लेकिन संशोधन में बोर्ड की बैठक के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को अलग से वैधानिक माध्यम घोषित करने वाला स्पष्ट प्रावधान दिखाई नहीं देता।
और यहीं धारा 110 महत्वपूर्ण हो जाती है।
धारा 110 बोर्ड को राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति से regulations बनाने की शक्ति देती है। इन्हीं regulations में बोर्ड की बैठक का समय, स्थान तथा procedure and conduct of business निर्धारित किया जा सकता है। ऐसे regulations के प्रकाशित होने का भी कानून में प्रावधान है।
इसलिए 26 सितंबर की बैठक के संबंध में असली सवाल यह है:
क्या यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पास राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति से बना ऐसा लागू regulation है, जो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग अथवा hybrid attendance को बोर्ड बैठक में वैधानिक उपस्थिति मानता है?
अगर ऐसा regulation मौजूद है तो उसे सार्वजनिक करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
अगर ऐसा regulation नहीं है, तो फिर virtual attendance को वैधानिक उपस्थिति मानने का आधार क्या था—यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।
मद्रास हाईकोर्ट की मिसाल क्या कहती है?
- S.J. Abul Hassan बनाम Tamil Nadu Waqf Board* मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने धारा 17 की व्याख्या करते हुए कहा था कि बोर्ड की बैठक regulations में निर्धारित स्थान पर होनी चाहिए। उस मामले में अदालत के सामने ऐसा कोई regulation प्रस्तुत नहीं किया गया था जो ई-मेल अथवा virtual mode से बोर्ड की बैठक/निर्णय की अनुमति देता हो। अदालत ने केवल ई-मेल से सदस्यों की सहमति को धारा 17 के तहत वैध बोर्ड resolution नहीं माना।
यह फैसला उत्तर प्रदेश पर स्वतः बाध्यकारी नहीं है और वहां के तथ्य अलग थे। फिर भी यह फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न जरूर सामने रखता है—statutory Waqf Board की बैठक और उसके resolution के लिए वैधानिक प्रक्रिया और लागू regulations का पालन कितना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के 2025 के वक्फ फैसले में VC की कोई सामान्य अनुमति नहीं
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को चुनौती देने वाले मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने 15 सितंबर 2025 को अंतरिम आदेश दिया। अदालत ने संशोधित कानून के कुछ प्रावधानों पर अंतरिम रोक/सीमाएं लगाईं और कुछ अन्य प्रावधानों को तत्काल रोकने से इनकार किया। लेकिन उस आदेश में वक्फ बोर्ड की बैठकों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कराने की कोई सामान्य अनुमति नहीं दी गई।
इसलिए 26 सितंबर की बैठक को सही ठहराने के लिए 2025 के सुप्रीम कोर्ट आदेश का सहारा लेना अपने आप पर्याप्त नहीं होगा।
कोरम का असली हिसाब क्या है?
बोर्ड के पुराने सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 22 अक्टूबर 2021 की अधिसूचना में आठ सदस्यों की नियुक्ति की गई थी। इनमें बेगम नूर बानो, जरयाब जमाल रिजवी, शहाबात हुसैन, अली जैदी, मौलाना रज़ा हुसैन और डॉ. नूरूस हसन नकवी सहित आठ नाम थे।
सरकारी अधिसूचना के अनुसार 15 नवंबर 2021 को बोर्ड की बैठक में अली जैदी को अध्यक्ष चुना गया था।
लेकिन 26 सितंबर 2026 के लिए केवल 2021 की सूची देखकर कोरम का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। उस तारीख की वैध सदस्य-सूची, रिक्त पद, कार्यकाल और लागू संक्रमणीय प्रावधानों को देखना जरूरी है।
यही कारण है कि बोर्ड को स्पष्ट करना चाहिए कि 26 सितंबर को कुल कितने वैध सदस्य थे और उनमें से कितने भौतिक तथा कितने virtual रूप से उपस्थित थे।
“प्राइवेट लिमिटेड कंपनी” का आरोप या संस्थागत जवाबदेही का सवाल?
वक्फ बोर्ड कोई निजी कंपनी नहीं बल्कि कानून के तहत गठित statutory body है।
इसलिए “अली जैदी ने बोर्ड को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना दिया” कहा जा रहा है।
लेकिन यदि बोर्ड की बैठकें, निर्णय और प्रस्ताव निर्धारित सामूहिक प्रक्रिया के बजाय सीमित सदस्यों की उपस्थिति तथा अस्पष्ट virtual procedure के आधार पर चलाए जाने का आरोप है, तो यह institutional accountability का गंभीर प्रश्न जरूर है।
चेयरमैन बोर्ड की अध्यक्षता करते हैं, लेकिन कानून में “Board” और “Chairperson” अलग-अलग भूमिकाएं हैं। धारा 17 स्वयं बोर्ड की बैठक और उपस्थित सदस्यों के मतदान की व्यवस्था करती है।
हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच का मुद्दा
26 सितंबर की बैठक के संदर्भ में एक और संवेदनशील पहलू सामने आता है। एक अन्य बोर्ड बैठक/दस्तावेज से संबंधित डॉ. नूरूस हसन नकवी और शहाबात हुसैन के हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच का मामला उच्च न्यायालय के समक्ष होने की बात कही जा रही है।
इस दावे के मूल न्यायिक आदेश की प्रति कहा जा सकता। लेकिन यदि वास्तव में ऐसा आदेश हुआ है तो संबंधित attendance sheet, minutes book, resolutions और हस्ताक्षरित रिकॉर्ड की सुरक्षित custody और जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
मौलाना रज़ा हुसैन साहब और जरयाब जमाल रिजवी की गैरमौजूदगी
26 सितंबर की बैठक में मौलाना रज़ा हुसैन और जरयाब जमाल रिजवी के शामिल न होने की जानकारी भी सामने आई है।
इसलिए बैठक का पूरा attendance record अब महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
कौन मौजूद था?
कौन virtual था?
कौन अनुपस्थित था?
किसे “present” माना गया?
और किस नियम के तहत?
यही चार सवाल पूरी तस्वीर स्पष्ट कर सकते हैं।
अब बोर्ड से सार्वजनिक किए जाने चाहिए ये दस्तावेज
दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग है—
1. 26 सितंबर की बैठक का notice और agenda
2. उस दिन की certified attendance sheet
3. लागू Board Regulations
4. VC/hybrid meeting की अनुमति वाला specific regulation
5. उस regulation की राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति
6. बैठक की minutes book
7. सभी पारित resolutions
8. virtual members का authentication/attendance record
9. उपलब्ध video recording
10. उस तारीख की आधिकारिक सदस्य-सूची
क्योंकि सवाल सिर्फ बैठक का नहीं, फैसलों की वैधानिकता का है
अगर ये सभी दस्तावेज यह साबित करते हैं कि virtual participation के लिए वैधानिक आधार मौजूद था और कोरम विधि के अनुसार पूरा हुआ था, तो विवाद काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगा।
लेकिन यदि ऐसा कोई लागू और स्वीकृत regulation सामने नहीं आता, तो 26 सितंबर के resolutions की procedural validity पर सवाल उठना स्वाभाविक है और किसी प्रभावित पक्ष द्वारा उचित वैधानिक मंच पर उसे चुनौती दी जा सकती है
सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि वक्फ जैसी सार्वजनिक महत्व की statutory संस्था में कानून, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।




