तहलका टुडे ब्यूरो |सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
लखनऊ,उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की कार्यशैली और प्रशासनिक निर्णयों पर उत्तर प्रदेश वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ ने ऐसा कड़ा प्रहार किया है जिसकी गूंज अब पूरे प्रदेश के वक्फ प्रशासन में सुनाई दे रही है। इमामबाड़ा आगा बाकर प्रकरण में न्यायाधिकरण ने बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) जीशान रिज़वी और अफसर मिर्जा को न्यायाधिकरण के आदेश की अवहेलना का दोषी मानते हुए एक माह के सिविल कारावास में निरुद्ध किए जाने का आदेश पारित कर दिया है।
एडवोकेट मोहम्मद हुसैन रिज़वी की बहस के बाद यह फैसला केवल एक मुकदमे का निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि उन आरोपों पर भी न्यायिक टिप्पणी माना जा रहा है जो वर्षों से वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, मनमाने आदेशों और प्रशासनिक हस्तक्षेप को लेकर उठते रहे हैं।
जब ट्रिब्यूनल ने कहा — आदेश स्थगित था, फिर लागू क्यों कराया गया?
मामला लखनऊ के ऐतिहासिक वक्फ इमामबाड़ा आगा बाकर से जुड़ा है। पूर्व मुतवल्लिया किश्वर जहां के इंतकाल के बाद प्रबंधन को लेकर विवाद शुरू हुआ। इसी दौरान शिया वक्फ बोर्ड के सीईओ द्वारा 26 जून 2025 को एक आदेश जारी कर प्रबंधन समिति और अफसर मिर्जा को संयुक्त रूप से मोहर्रम से संबंधित कार्यों के लिए अधिकृत किया गया था।
इस आदेश को चुनौती देते हुए वाद दायर किया गया और 21 अगस्त 2025 को वक्फ न्यायाधिकरण ने उक्त आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।
लेकिन न्यायाधिकरण के अनुसार इसके बावजूद 11 सितम्बर 2025 को बोर्ड के सीईओ ने एक नया पत्र जारी कर उसी व्यवस्था को व्यवहार में लागू कराने का प्रयास किया, जिसे पहले ही स्थगित किया जा चुका था।
यहीं से मामला अवमानना तक पहुंच गया।
फैसले में क्या कहा न्यायाधिकरण ने?
तीन सदस्यीय पीठ ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट कहा कि 11 सितम्बर 2025 का पत्र केवल स्पष्टीकरण मांगने के लिए नहीं था बल्कि उसकी भाषा से साफ जाहिर होता है कि स्थगित किए जा चुके आदेश को पुनः लागू कराने का प्रयास किया जा रहा था।
न्यायाधिकरण ने कहा कि कथित अनियमितताओं की आड़ लेकर पहले से स्थगित आदेश को प्रभावी बनाने की कोशिश की गई, जो न्यायाधिकरण के अंतरिम आदेश का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
फैसले में यह भी दर्ज किया गया कि यदि 26 जून 2025 का आदेश केवल मोहर्रम माह तक सीमित था, जैसा कि बोर्ड ने अपने बचाव में कहा, तो फिर उसी आदेश का हवाला देकर बाद की प्रशासनिक कार्रवाई क्यों की गई?
यह प्रश्न स्वयं बोर्ड के तर्कों को कटघरे में खड़ा करता है।
दान पेटी, बैंक खाते और शिकायतों का भी हुआ जिक्र
सुनवाई के दौरान बोर्ड की ओर से प्रबंधन समिति पर दान पेटी खोलने, बैंक खाता न संचालित करने और अन्य अनियमितताओं के आरोप लगाए गए।
लेकिन न्यायाधिकरण ने माना कि यदि ऐसी शिकायतें थीं तो उनके लिए विधिक प्रक्रिया उपलब्ध थी। किसी भी शिकायत को आधार बनाकर न्यायालय द्वारा स्थगित आदेश को लागू नहीं कराया जा सकता।
ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट संकेत दिया कि कानून से ऊपर कोई प्रशासनिक अधिकारी नहीं है और न्यायिक आदेशों की अवहेलना को किसी बहाने से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
एक माह की सजा और बड़ा संदेश
आदेश 39 नियम 2-ए सीपीसी के तहत न्यायाधिकरण ने कहा कि अंतरिम निषेधाज्ञा का उल्लंघन सिद्ध होने पर सिविल कारावास का प्रावधान है और इसी आधार पर दोनों विपक्षियों को एक माह के लिए सिविल कारावास में भेजे जाने का आदेश दिया गया।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि वक्फ मामलों में इस प्रकार का आदेश अत्यंत दुर्लभ है और इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि न्यायाधिकरण के आदेशों को हल्के में लेना किसी भी अधिकारी के लिए भारी पड़ सकता है।
वक्फ बोर्ड में मचा हड़कंप
फैसला सामने आते ही वक्फ बोर्ड से जुड़े हलकों में हलचल तेज हो गई है। जानकारों का कहना है कि यह आदेश केवल दो व्यक्तियों के खिलाफ नहीं बल्कि उस प्रशासनिक सोच पर सवाल है जिसके तहत न्यायिक आदेशों की व्याख्या अपने अनुसार करने की कोशिश की जाती रही है।
वक्फ संपत्तियों के संरक्षण और पारदर्शिता की मांग करने वाले कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस निर्णय को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि यह फैसला वक्फ प्रशासन में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
अब आगे क्या होगा?
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देगा या न्यायाधिकरण के आदेश का पालन करेगा।
लेकिन इतना तय है कि 24 जून 2026 का यह फैसला आने वाले समय में वक्फ प्रशासन और न्यायिक जवाबदेही से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में याद किया जाएगा।
यह निर्णय उन सभी संस्थाओं और अधिकारियों के लिए भी संदेश है कि न्यायालय के आदेश केवल कागज़ के दस्तावेज नहीं होते, बल्कि उनका पालन करना कानूनन अनिवार्य होता है।




