नजफ़-ए-हिंद, जोगीपुरा
जहाँ मौला अली (अ.स.) की याद ने एक गाँव को अमर कर दिया
एक वक्फ़नामे, एक करामत और एक खानदान की चार सौ साल की दास्तान
“जायदादें वारिसों में बँट जाती हैं, लेकिन अमानतें सदियों तक इंसानियत की हो जाती हैं…”
सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
हिंदुस्तान की धरती पर न जाने कितने शहर बने, कितने उजड़े, कितनी सल्तनतें आईं और चली गईं। बादशाहों के महल मिट्टी हो गए, फौजों के निशान इतिहास के पन्नों में खो गए। लेकिन कुछ जगहें ऐसी होती हैं जिन्हें न तलवार मिटा सकती है, न वक्त।
बिजनौर की धरती पर बसा अहमदपुर सादात उर्फ़ जोगीपुरा भी ऐसी ही एक जगह है।
यह केवल एक गाँव नहीं।
यह केवल एक दरगाह नहीं।
यह केवल एक मजार नहीं।
यह एक ऐसी रूहानी अमानत है, जिसे स्थानीय परंपरा में “नजफ़-ए-हिंद” कहा गया—क्योंकि लोगों की आस्था के अनुसार यह स्थान हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) की याद, उनकी करामत और उनके नाम से जुड़ी एक मुबारक निशानी का केंद्र बन गया।
जब मुग़ल सल्तनत काँप उठी
सन 1657।
दिल्ली और आगरा का लाल किला बेचैन था।
खबर फैल गई—
“बादशाह शाहजहाँ का इंतिकाल हो गया।”
हालाँकि वे जीवित थे, लेकिन बीमारी ने पूरे मुल्क में अफ़वाह फैला दी।
चारों शहज़ादे तख़्त के लिए निकल पड़े।
खून का रिश्ता…
ताज के सामने छोटा पड़ गया।
एक भाई ने दूसरे भाई पर तलवार उठाई।
आख़िरकार औरंगज़ेब जीत गया।
उसने अपने पिता शाहजहाँ को ही आगरा के किले में क़ैद कर दिया।
जो कल तक बादशाह के वफ़ादार थे…
आज मौत की सूची में थे।
एक वफ़ादार जिसने ताज नहीं, ज़मीर चुना
उन वफ़ादारों में एक नाम था—
सैयद राजू रहमतुल्लाह अलैह।
वह सत्ता का आदमी नहीं था।
वह वफ़ा का आदमी था।
उसे मालूम था—
अब दिल्ली में उसके लिए जगह नहीं बची।
वह अपने पुश्तैनी गाँव…
जोगी रामपुरा (वर्तमान जोगीपुरा) लौट आया।
गाँव वालों ने उसे छिपा लिया।
दिन में जंगल…
रात में दुआ…
यही उसकी ज़िंदगी बन गई।
जंगल में उठती एक पुकार
हर रात…
घने जंगल में…
एक अकेली आवाज़ गूँजती—
“नाद-ए-अली…”
“या अली अद्रिकनी…”
पेड़ सुनते।
हवा सुनती।
सितारे सुनते।
और शायद…
आसमान भी सुनता था।
बूढ़ा ब्राह्मण
एक सुबह…
एक वृद्ध ब्राह्मण घास काट रहा था।
उम्र इतनी कि आँखें साथ छोड़ चुकी थीं।
अचानक…
घोड़े की टाप सुनाई दी।
उसने सिर उठाया।
एक नूरानी सवार सामने खड़ा था।
उसने पूछा—
“राजू कहाँ है… जो मुझे हर रोज़ पुकारता है?”
बूढ़ा काँप गया।
कहा—
“मालिक…
मैं तो ठीक से देख भी नहीं सकता…
जंगल तक कैसे जाऊँ?”
इतना सुनना था कि उसकी आँखों में रोशनी लौट आई।
जिस्म में ताक़त आ गई।
सवार ने मुस्कुराकर कहा—
“अब जाओ… उसे कहो… मैं आया हूँ।”
सात दिन की प्रतीक्षा
राजू दादा दौड़ पड़े।
गाँव वाले भी पीछे।
जब वह पहुँचे…
तो कोई दिखाई नहीं दिया।
लेकिन…
घोड़े के खुरों के निशान मिट्टी पर मौजूद थे।
राजू दादा उसी जगह बैठ गए।
उन्होंने खाना छोड़ दिया।
पानी छोड़ दिया।
सिर्फ़ एक आवाज़…
“या अली…”
एक दिन…
दो दिन…
तीन दिन…
सात दिन…
बशारत
सातवीं रात…
रूहानी सुकून उतरा।
स्थानीय परंपरा के अनुसार, हज़रत अली (अ.) ने राजू दादा को बशारत दी—
“डरो मत… औरंगज़ेब तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।”
राजू दादा रो पड़े।
उन्होंने कहा—
“मौला…
मेरे लिए कुछ नहीं चाहिए…
मेरी कौम के लिए कोई ऐसी निशानी छोड़ जाइए…
जो सदियों तक लोगों के काम आए।”
चश्मा
कहा जाता है…
उसी क्षण…
धरती फटी।
उसमें से पानी निकला।
मीठा…
ठंडा…
शफ़ा देने वाला।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, वहीं एक समय दूध जैसा चश्मा भी प्रकट हुआ था।
लोग दूर-दूर से आने लगे।
कोई पानी लेकर जाता।
कोई मिट्टी।
कोई दुआ।
कोई उम्मीद।
बारगाह
जहाँ वह मुबारक निशानी थी…
वहीं एक बारगाह-ए-अलवी बनी।
फिर मस्जिद बनी।
फिर इमामबाड़ा।
फिर मेहमानख़ाना।
फिर ज़ायरीन के मकान।
और जब सैयद राजू रहमतुल्लाह अलैह का विसाल हुआ…
तो उसी बाग़ में उनकी मजार बनाई गई।
ढाई सौ साल बाद
समय बीत गया।
मुग़ल खत्म हो गए।
अंग्रेज़ आ गए।
लेकिन दरगाह आबाद रही।
चश्मा बहता रहा।
मजलिसें होती रहीं।
मुसाफ़िर आते रहे।
20 अप्रैल 1931
उस दिन…
एक ऐसा फैसला हुआ…
जिसने जोगीपुरा को हमेशा के लिए बदल दिया।
सैयद नज़र अब्बास और पूरे खानदान ने कहा—
“यह दरगाह हमारी नहीं है।
यह हमारी औलाद की भी नहीं है।
यह अल्लाह की अमानत है।”
उन्होंने—
दरगाह…
मस्जिद…
इमामबाड़ा…
मेहमानख़ाना…
मजार…
बाग़…
ज़ायरीन के मकान…
लगभग 6 बीघा से अधिक वक्फ़ी भूमि…
सब कुछ वक्फ़ अलल औलाद फ़ी सबीलिल्लाह कर दिया।
उन्होंने साफ़ लिखा—
कोई इसे बेचेगा नहीं।
कोई गिरवी नहीं रखेगा।
कोई हिबा नहीं करेगा।
मुतवल्ली मालिक नहीं होगा।
वह केवल अमानतदार होगा।
क्यों किया गया वक्फ़?
उन्होंने इसलिए वक्फ़ नहीं किया कि ज़मीन बच जाए।
उन्होंने इसलिए वक्फ़ किया…
कि करामत की निशानी बची रहे।
चश्मा बचा रहे।
बारगाह बची रहे।
मजार बची रहे।
गरीब का खाना चलता रहे।
मुसाफ़िर का बिस्तर बिछा रहे।
मजलिसें होती रहें।
और आने वाली नस्लें यह न कह सकें—
“यह हमारी जायदाद है।”
बल्कि कहें—
“यह हमारी अमानत है।”
आज…
जब कोई जोगीपुरा की उस पुरानी बारगाह में दाख़िल होता है…
तो वह सिर्फ़ एक इमारत नहीं देखता।
वह चार सदियों की दास्तान देखता है।
एक वफ़ादार सैयद की वफ़ा…
एक बूढ़े ब्राह्मण की गवाही…
एक रूहानी करामत की लोक-परंपरा…
एक चश्मे की ठंडक…
एक मजार की ख़ामोशी…
और 1931 के उस वक्फ़नामे की स्याही…
जो आज भी कहती है—
**”जायदादें इंसानों की होती हैं…
लेकिन अमानतें अल्लाह की होती हैं।
जिसने अमानत को जायदाद बना लिया…
उसने इतिहास नहीं, अपना ज़मीर खो दिया।”**
यही जोगीपुरा है।
यही उसकी पहचान है।
और इसी वजह से श्रद्धा रखने वाले लोग उसे प्रेम से “नजफ़-ए-हिंद” कहते हैं।
आगे भी पढ़ते रहिए………




