तहलका टुडे डेस्क/अली मुस्तफा
लखनऊ |तहज़ीब, तमद्दुन, अदब और मेहमाननवाज़ी की सरज़मीन… नवाबों की नगरी लखनऊ, जहां की गलियों में इतिहास सांस लेता है, जहां की ज़बान में मिठास और व्यवहार में अदब की पहचान मिलती है। यही वह शहर है जो भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र है और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजधानी भी।
अब इसी ऐतिहासिक शहर में 27 अक्टूबर को ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़र क़ालिबाफ़ के आगमन की खबर ने राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक हलकों में दिलचस्पी बढ़ा दी है।
भारत की सुप्रीम रिलीजियस अथॉरिटी, आफताबे शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी ने आज आसिफी मस्जिद में जुमे की नमाज़ के दौरान ऐलान किया कि ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़र क़ालिबाफ़ 27 अक्टूबर को लखनऊ आएंगे। मौलाना साहब के मुताबिक, उसी शाम छोटे इमामबाड़े में हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की विलादत की खुशी में आयोजित जश्न की महफिल में क़ालिबाफ़ शिरकत करेंगे।
मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी ने तमाम अंजुमनों से इस मौके पर क़ालिबाफ़ के इस्तकबाल के लिए तैयार रहने की अपील की है। यह ऐलान ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और ईरान के संबंधों, पश्चिम एशिया की परिस्थितियों और दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संपर्कों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जारी है।
नवाबों की नगरी में अंतरराष्ट्रीय मेहमान का इस्तकबाल
लखनऊ की पहचान केवल उसकी इमारतों, इमामबाड़ों और ऐतिहासिक स्मारकों से नहीं, बल्कि उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब, अदब, इल्म और मेहमाननवाज़ी से भी है। यहां आने वाले मेहमानों का स्वागत केवल एक रस्म नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजधानी होने के कारण लखनऊ राष्ट्रीय राजनीति में भी विशेष स्थान रखता है। ऐसे शहर में ईरानी संसद अध्यक्ष की आमद राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संपर्कों के लिहाज़ से खास दिलचस्पी पैदा करती है।
छोटे इमामबाड़े में जश्ने विलादत की महफिल इस दौरे का प्रमुख आकर्षण होगी। मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी की तमाम अंजुमनों से इस्तकबाल की अपील के बाद अब 27 अक्टूबर की शाम के कार्यक्रम पर निगाहें टिकी हैं।
कौन हैं मोहम्मद बाक़र क़ालिबाफ़?
23 अगस्त 1961 को जन्मे मोहम्मद बाक़र क़ालिबाफ़ ईरान के प्रमुख राजनीतिक नेताओं में शामिल हैं। वह ईरानी संसद, जिसे मजलिस कहा जाता है, के अध्यक्ष हैं। वर्ष 2005 से 2017 तक तेहरान के मेयर रहने के अलावा वह ईरान की पुलिस व्यवस्था और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के एयरोस्पेस बल में भी वरिष्ठ जिम्मेदारियां निभा चुके हैं।
उनका राजनीतिक सफर प्रशासन, सुरक्षा और राष्ट्रीय राजनीति के विभिन्न पड़ावों से होकर गुजरा है। यही वजह है कि उन्हें ईरान की राजनीतिक व्यवस्था का एक प्रभावशाली चेहरा माना जाता है।
आसमान की उड़ान से सियासत के शिखर तक
क़ालिबाफ़ की सार्वजनिक छवि का एक दिलचस्प पहलू उनका विमानन से जुड़ा अनुभव है। विमानन से जुड़े अनुभव, तेहरान के प्रशासन और फिर संसद के शीर्ष पद तक पहुंचने का उनका सफर उन्हें एक अलग पहचान देता है।
लेकिन किसी भी राजनेता का महत्व केवल उसके अतीत से नहीं, बल्कि वर्तमान में उसकी भूमिका और फैसलों से भी तय होता है। क़ालिबाफ़ का नाम आज ईरान की संसदीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की चर्चाओं में शामिल है।
BRICS संसदीय मंच और भारत यात्रा का संदर्भ
क़ालिबाफ़ की भारत यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब पश्चिम एशिया की परिस्थितियों, क्षेत्रीय स्थिरता और भारत-ईरान संबंधों पर दुनिया की निगाहें हैं। 26 और 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित BRICS संसदीय मंच में उनकी भागीदारी की खबर भी सामने आई है।
BRICS संसदीय मंच सदस्य देशों के बीच संवाद, सतत विकास, वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार और तकनीकी बदलाव जैसे विषयों पर विचार-विमर्श का अवसर देता है। ऐसे मंचों पर उच्चस्तरीय प्रतिनिधियों की भागीदारी संसदीय कूटनीति को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है।
लखनऊ और ईरान के रिश्ते: इतिहास, संस्कृति और अकीदत का सिलसिला
लखनऊ और ईरान के संबंधों की जड़ें इतिहास, साहित्य, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत में गहराई तक फैली हैं। अवध की तहज़ीब, इमामबाड़ों की विरासत, मजलिसों और अज़ादारी की परंपराओं ने लखनऊ को शिया संस्कृति के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में पहचान दिलाई है।
ऐसे शहर में ईरान की संसद के अध्यक्ष का आगमन और इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की विलादत के जश्न में उनकी शिरकत की घोषणा विशेष महत्व रखती है। यह अवसर राजनीतिक प्रतिनिधित्व और धार्मिक-सांस्कृतिक संपर्कों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।
क़ालिबाफ़ से पहले भी ईरान के बड़े नेता आ चुके हैं लखनऊ
लखनऊ और ईरान के बीच उच्चस्तरीय संपर्कों का इतिहास भी चर्चा में है। आपके उपलब्ध कराए गए विवरण के मुताबिक, आयतुल्लाह रंजफंजानी भी ईरान की संसद के अध्यक्ष और बाद में राष्ट्रपति की हैसियत से लखनऊ आ चुके हैं।
27 अक्टूबर की शाम पर रहेंगी निगाहें
मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी के ऐलान और तमाम अंजुमनों से इस्तकबाल की अपील के बाद अब 27 अक्टूबर की शाम का इंतजार किया जा रहा है। छोटे इमामबाड़े में आयोजित होने वाली जश्ने विलादत की महफिल में क़ालिबाफ़ की शिरकत इस दौरे का प्रमुख आकर्षण होगी।
लखनऊ की मेहमाननवाज़ी, उसकी अदबी विरासत और धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के बीच यह दौरा शहर को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा से जोड़ सकता है।
लखनऊ केवल उत्तर प्रदेश की राजधानी या एक संसदीय क्षेत्र का नाम नहीं, बल्कि सदियों से संजोई गई तहज़ीब और सांस्कृतिक साझेदारी की पहचान है। ऐसे शहर में ईरान की संसद के अध्यक्ष की आमद भारत-ईरान संबंधों और दोनों समाजों के बीच संवाद को समझने का अवसर है। अब देखना होगा कि 27 अक्टूबर का यह दौरा किन मुलाकातों और गतिविधियों के साथ आगे बढ़ता है।
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