सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा/तहलका टुडे टीम/9452000001srm@,gmail.com
हरिद्वार।कुछ कहानियाँ तारीख़ से शुरू नहीं होतीं, वे किसी ख़ुशबू से शुरू होती हैं। कोई पुरानी ख़ुशबू—जो सदियों का सफ़र तय करके अचानक आज की हवा में महसूस होने लगे।
गंगा के किनारे जब शाम उतरती है, आरती की आवाज़ फ़िज़ाओं में घुलती है और नदी अपनी रवानी में सदियों की दास्तान सुनाती है, तो ऐसा लगता है जैसे हिन्दुस्तान का माज़ी आज भी कहीं आसपास मौजूद है।
कभी इन्हीं रास्तों से हिन्दुस्तान और ईरान के बीच क़ाफ़िले गुज़रे थे। उनके साथ सिर्फ़ सामान नहीं था—ज़बान थी, शायरी थी, फ़लसफ़ा था, इल्म था, अदब था और इंसानों को जोड़ने वाले रिश्तों की दौलत थी।
अब उसी पुराने रिश्ते की एक नई कहानी हरिद्वार की धरती पर लिखे जाने की तैयारी है।
29 से 31 अक्टूबर 2026 तक यूनिवर्सिटी ऑफ़ पतंजलि, हरिद्वार में 52वां ऑल इंडिया ओरिएंटल कॉन्फ़्रेंस आयोजित होने जा रहा है। यह आयोजन भारत की इल्मी और तहज़ीबी विरासत के अलग-अलग पहलुओं को एक मंच पर लाने के साथ ईरानी, अरबी और फ़ारसी स्टडीज़ को भी ख़ास अहमियत देगा।
लेकिन यह सिर्फ़ एक कॉन्फ़्रेंस नहीं लगता—बल्कि दो पुरानी तहज़ीबों के बीच एक नई गुफ़्तगू की शुरुआत जैसा महसूस होता है।
यह सिर्फ़ कॉन्फ़्रेंस नहीं, दो तहज़ीबों की गुफ़्तगू है
कभी-कभी तारीख़ सिर्फ़ तारीख़ नहीं होती। वह अपने साथ सदियों की आवाज़ लेकर आती है।
पतंजलि यूनिवर्सिटी में होने वाले इस आयोजन में सवाल सिर्फ़ यह नहीं होगा कि फ़ारसी अदब क्या है, अरबी ज़बान की रवायत कितनी पुरानी है या हिंद-ईरानी तारीख़ के पन्नों में क्या दर्ज है।
बड़ा सवाल यह होगा—
हिन्दुस्तान और ईरान ने सदियों के सफ़र में एक-दूसरे को क्या दिया और आज की दुनिया उस रिश्ते से क्या सीख सकती है?
ईरानी, अरबी और फ़ारसी स्टडीज़ के ख़ास सेशन में हिंद-ईरानी इश्तराक़ात, हिंद-ईरानी ज़बान और अदब, तारीख़, सक़ाफ़त और असातिरी रवायतें, हिन्दुस्तान में तख़्लीक़ किया गया फ़ारसी अदब, अरब दुनिया से हिन्दुस्तान के ताल्लुक़ात और हिन्दुस्तान में तख़्लीक़ किया गया अरबी अदब जैसे मौज़ूआत पर इल्मी बहस होगी।
इस ख़ुसूसी सेशन की सदारत प्रो. बलराम शुक्ला, दिल्ली यूनिवर्सिटी करेंगे।
मसूद पेज़ेशकियान की हिन्दुस्तान आमद से जुड़ता एक नया बाब
इस पूरी कहानी का एक दिलचस्प और ताज़ा पहलू ईरानी सदर डॉ. मसूद पेज़ेशकियान की BRICS 2026 के सिलसिले में हिन्दुस्तान आमद भी है।
उनकी हिन्दुस्तान यात्रा के दौरान भारत और ईरान के रिश्तों, बाहमी तआवुन और इलाक़ाई मसाइल पर अहम गुफ़्तगू हुई।
इसी दौरान कई धर्म गुरुओं के बीच पतंजलि ग्रुप के आचार्य बालकृष्ण जी ने ईरानी सदर मसूद पेज़ेशकियान से मुलाक़ात की। इस मौक़े पर उनका शाल ओढ़ाकर इस्तक़बाल और सम्मान किया गया। आचार्य बालकृष्ण जी ने उनके सामने अपनी तक़रीर भी पेश की और भारत तथा ईरान के बीच पुराने रिश्तों और इंसानी व तहज़ीबी क़रीबी की बात रखी।
यह मंज़र अपने आप में एक ख़ूबसूरत पैग़ाम था—
एक तरफ़ हिन्दुस्तान की मिट्टी, दूसरी तरफ़ ईरान की तहज़ीब; और बीच में एक शाल, एक मुलाक़ात और दिल से निकली हुई गुफ़्तगू।
यही तस्वीर अब पतंजलि यूनिवर्सिटी में होने वाले ईरानी, अरबी और फ़ारसी स्टडीज़ के सेशन को और भी मायनेख़ेज़ बना देती है।
जहाँ संस्कृत की आवाज़ फ़ारसी से मिलेगी
पतंजलि की सरज़मीन पर यह आयोजन सिर्फ़ रिसर्च पेपर पढ़ने की औपचारिक महफ़िल नहीं होगा।
यहाँ इल्म होगा, अदब होगा, तारीख़ होगी, शास्त्रार्थ होगा, काव्य होगा और मुख़्तलिफ़ इल्मी रवायतों के बीच तबादला-ए-ख़याल होगा।
एक तरफ़ वेद और संस्कृत की सदियों पुरानी रवायत होगी, दूसरी तरफ़ फ़ारसी और अरबी अदब की दुनिया।
कहीं दर्शन पर बहस होगी, कहीं तारीख़ अपने पुराने पन्ने खोलेगी और कहीं शायरी यह बताएगी कि ज़बानें अलग हो सकती हैं, मगर इंसान के जज़्बात एक जैसे होते हैं।
शायद इसी को तहज़ीब कहते हैं—एक-दूसरे को बदलना नहीं, एक-दूसरे को समझना।
एक छोटी कोशिश, एक बड़ा पैग़ाम
इस इल्मी पहल के पीछे सोशल रिफ़ॉर्मर मौलाना सैयद कल्बे रूशैद रिज़वी साहब की कोशिश को भी अहम माना जा रहा है।
कभी-कभी बड़े बदलाव किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि किसी एक शख़्स की छोटी-सी कोशिश से शुरू होते हैं।
एक कोशिश जो ज़बानों के बीच फ़ासले कम करे।
एक कोशिश जो मज़हब और सरहद से ऊपर उठकर तहज़ीब को समझे।
एक कोशिश जो यह याद दिलाए कि इल्म की कोई सरहद नहीं होती और अदब का कोई पासपोर्ट नहीं होता।
हिन्दुस्तान और ईरान—एक रिश्ता जो किताबों से कहीं पुराना है
हिन्दुस्तान और ईरान के रिश्ते सिर्फ़ हुकूमतों और सियासत तक महदूद नहीं रहे।
इनके बीच तिजारत के रास्ते रहे, सूफ़ियों की आवाज़ रही, शायरों की महफ़िलें रही, किताबों के सफ़र रहे और आम इंसानों की मोहब्बत रही।
फ़ारसी ने हिन्दुस्तान में सिर्फ़ दरबारों की ज़बान बनकर वक़्त नहीं गुज़ारा, बल्कि हिन्दुस्तानी मिट्टी में उतरकर यहाँ के अदब और सक़ाफ़त का हिस्सा बन गई।
इसीलिए पतंजलि यूनिवर्सिटी में होने वाला यह प्रोग्राम पुराने रिश्ते को सिर्फ़ याद करने का मौक़ा नहीं, बल्कि उसे नई नस्ल के लिए नई ज़बान देने की कोशिश भी है।
रिसर्च स्कॉलर्स के लिए बड़ा मौक़ा
ईरानी, अरबी और फ़ारसी स्टडीज़ समेत मुख़्तलिफ़ मौज़ूआत पर एब्स्ट्रैक्ट और फ़ुल रिसर्च पेपर आमंत्रित किए गए हैं।
एब्स्ट्रैक्ट/फ़ुल पेपर जमा करने की आख़िरी तारीख़: 30 सितंबर 2026
कॉन्फ़्रेंस 29 से 31 अक्टूबर 2026 तक यूनिवर्सिटी ऑफ़ पतंजलि, हरिद्वार में होगी।
डेलीगेशन फ़ीस 10 अक्टूबर 2026 तक—
स्टूडेंट्स — ₹1,500
फ़ैकल्टी मेंबर्स — ₹2,500
अन्य — ₹3,000
रिसर्च पेपर पेश करने वाले स्टूडेंट्स के लिए 50 फ़ीसदी रियायत भी रखी गई है।
और कहानी अभी बाक़ी है…
हर अच्छी कहानी के आख़िर में एक सवाल रह जाता है।
शायद इस कहानी में भी—
क्या गंगा के किनारे संस्कृत और फ़ारसी फिर एक-दूसरे से गुफ़्तगू करेंगी?
क्या भारत और ईरान की सदियों पुरानी दोस्ती को नई नस्ल एक नई नज़र से देखेगी?
क्या इल्म और अदब वह पुल बना सकते हैं, जिसे सियासत अक्सर बनाने में नाकाम रहती है?
जवाब शायद अक्टूबर में हरिद्वार की उसी फ़िज़ा में तलाशे जाएंगे।
गंगा बहती रहेगी…
पतंजलि की रवायत साँस लेती रहेगी…
और शायद उसी दरमियान फ़ारसी का कोई शेर, अरबी की कोई आवाज़ और संस्कृत का कोई मंत्र एक-दूसरे से यह कहता सुनाई दे—
“ज़बानें मुख़्तलिफ़ हो सकती हैं, मगर इंसानियत की ज़बान एक है।”
तहलका टुडे — ख़बर नहीं, उसके पीछे छुपी दास्तान तक।





