कसर-उल-अज़ा (सफेद बारादरी): अंग्रेज़ी ज़ुल्म की जिंदा गवाही और शिया समुदाय की अधूरी आज़ादी जहाँ “या हुसैन” की सदा गूंजती थी, आज वहाँ शादियाँ और मेले लगते हैं — यह हमारी सांस्कृतिक शर्म है
तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा लखनऊ के कैसरबाग़ में खड़ी सफेद बारादरी,…


