तहलका टुडे टीम डेस्क
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित मौजा औरंगाबाद जागीर, तहसील व जिला लखनऊ की बहुमूल्य वक्फ अच्छे मिर्ज़ा संख्या I-987 की लगभग 366 बीघा भूमि को लेकर खुर्द बुर्द करने का इल्ज़ाम यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अली जैदी और उनके साले पर लगा है,एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एयरपोर्ट, बिजनौर रोड और शहीद पथ से सटी यह भूमि आज अरबों रुपये की बताई जाती है, लेकिन आरोप है कि इस वक्फ की संपत्ति का संरक्षण करने के बजाय उसे वर्षों तक अपने नियंत्रण में रखकर उसकी पारदर्शिता और उपयोगिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए गए।
ईश्वर के नाम वक्फ की गई थी यह विशाल संपत्ति
दस्तावेजों के अनुसार 10 सितम्बर 1920 को यह वक्फ स्थापित किया गया था और उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड में विधिवत दर्ज है। वर्ष 1999 में तत्कालीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी मुनीर हैदर के हस्ताक्षर से निम्नलिखित गाटा/खसरा संख्याएँ वक्फ के अभिलेखों में दर्ज की गई थीं:
705, 706, 707, 708, 709, 710, 1132, 1133, 1134, 1135, 1136, 1142, 1143, 819, 845, 1121, 1124, 1125, 1128, 1129, 839, 844, 841, 822, 836, 838, 848, 849, 850, 612, 611, 602, 691, 692, 693, 694, 696, 697, 698, 699, 701, 702, 703, 685, 686, 687, 688, 689, 690, 855, 856, 857, 861, 851, 852, 929, 1215, 862, 922, 926, 388, 854, 853, 901, 877, 868, 879 सहित अनेक भूखंड।
यह पूरी संपत्ति ईश्वर के नाम वक्फ की गई थी ताकि उससे धार्मिक, सामाजिक और जनकल्याणकारी कार्य किए जा सकें तथा वक्फनामे के अनुसार लाभार्थियों और खानदान को भी उसका वैधानिक लाभ प्राप्त हो।
एक साल का नियंत्रण, साढ़े चार साल का कब्ज़ा!
आरोप है कि तत्कालीन चेयरमैन अली जैदी ने इस वक्फ को एक वर्ष के लिए सीधे नियंत्रण में लिया था, लेकिन 01 जून 2026 तक भी यह वक्फ बोर्ड के प्रत्यक्ष नियंत्रण में बना हुआ है।
सवाल उठ रहा है कि जब नियंत्रण की अवधि एक वर्ष थी, तो फिर साढ़े चार वर्ष से अधिक समय तक यह व्यवस्था किस आधार पर जारी रखी गई?
चेयरमैन अली जैदी और साले अमील शम्सी की कथित मिलीभगत पर उठे सवाल
वक्फ से जुड़े लोगों का आरोप है कि तत्कालीन चेयरमैन अली जैदी और उनके रिश्तेदार सगे साले अमील शम्सी के बीच कथित मिलीभगत के चलते इस बहुमूल्य संपत्ति के मामलों में पारदर्शिता नहीं बरती गई।
आरोप यह भी हैं कि वक्फ की आय, मुकदमों की पैरवी, कब्जों की वापसी और भूमि प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में ऐसे कदम उठाए गए जिनसे वक्फ और उसके लाभार्थियों को नुकसान पहुँचा, जबकि कुछ प्रभावशाली माफिया लोगों को लाभ मिला।
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग लगातार उठ रही है।

मुकदमों की पैरवी नहीं, अदम पैरवी में खारिज कराने का आरोप
परिवार और संबंधित पक्षों का आरोप है कि युपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के नियंत्रण में रहते हुए विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन मुकदमों की गंभीरता से पैरवी नहीं की गई। कई मामलों में वक्फ के हितों की रक्षा करने के बजाय मुकदमों को कमजोर होने दिया गया और अदम पैरवी में खारिज होने तक की नौबत आ गई।
यदि यह आरोप सही सिद्ध होते हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि वक्फ संपत्ति के साथ गंभीर अन्याय माना जाएगा।
4.5 बीघा भूमि का कब्ज़ा दिलाकर फिर वापस कराने का आरोप
बताया जाता है कि खसरा संख्या 707, 684 और 520 सहित लगभग 4.5 बीघा भूमि का कब्ज़ा 30 दिसम्बर 2022 को वक्फ अच्छे मिर्ज़ा को प्राप्त हुआ था।
लेकिन आरोप है कि बाद में प्रभावशाली लोगों से सांठगांठ कर यह कब्ज़ा पुनः दूसरे पक्ष को वापस करा दिया गया। यह आरोप यदि सही हैं तो पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक हो जाती है।
आफताब-ए-शरीयत का सपना: यहाँ बने इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी
धार्मिक और सामाजिक हलकों में यह बात लंबे समय से कही जाती रही है कि आफताब-ए-शरीयत की दिली ख्वाहिश थी कि औरंगाबाद जागीर की इस विशाल वक्फ भूमि पर एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की यूनिवर्सिटी स्थापित की जाए, जहाँ आधुनिक और धार्मिक शिक्षा का समन्वय हो।
ऐसी यूनिवर्सिटी बनने से न केवल वक्फ की संपत्ति का सही और स्थायी उपयोग होता बल्कि हजारों विद्यार्थियों को शिक्षा मिलती, रोजगार के अवसर पैदा होते और वक्फनामे के अनुसार खानदान एवं लाभार्थियों को भी वैधानिक लाभ प्राप्त होता।
लेकिन अब जब इस भूमि को लेकर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं, तो समाज के जिम्मेदार वर्गों में गहरी चिंता और बेचैनी दिखाई दे रही है।
मुख्यमंत्री से उच्चस्तरीय जांच की मांग
मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई, एसआईटी, ईडी, आयकर विभाग, से और मोबाइल सर्विलांस और वित्तीय लेन-देन की फोरेंसिक जांच की मांग उठाई जा रही है।
समाज के विभिन्न वर्गों ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि:
366 बीघा वक्फ भूमि का वास्तविक लाभ किसे मिला?
वक्फ बोर्ड के प्रत्यक्ष नियंत्रण की अवधि क्यों बढ़ाई गई?
लाभार्थियों को उनका अधिकार क्यों नहीं मिला?
मुकदमों की प्रभावी पैरवी क्यों नहीं हुई?
क्या वक्फ संपत्ति के प्रबंधन में किसी प्रकार की अनियमितता हुई?
सबसे बड़ा सवाल
ईश्वर के नाम वक्फ की गई अरबों रुपये की यह संपत्ति आखिर किसके हित में इस्तेमाल हुई — वक्फ, समाज और लाभार्थियों के लिए, या फिर कुछ प्रभावशाली लोगों के लिए?
आज लखनऊ से उठ रहा यही सवाल पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग मांग कर रहे हैं कि सच्चाई सामने आए तथा वक्फ संपत्तियों की हिफाज़त सुनिश्चित की जाए।
आफताब ए शरीयत इस मामले समेत कई यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के घोटालों को लेकर जुमा मस्जिद में आवाम के सामने पेश कर चुके है और मुख्यमंत्री से जांच की मांग भी कर चुके है।




