तहलका टुडे टीम
कभी-कभी लोकतंत्र की सबसे कड़वी तस्वीर अदालत की चौखट पर दिखाई देती है।
सुप्रीम कोर्ट में जजों, न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों और वकीलों के खिलाफ गुमनाम शिकायतों का मामला पहुंचा तो अदालत ने इसे गंभीरता से लिया। रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतों के स्रोत की जांच और जरूरत पड़ने पर आपराधिक कार्रवाई के संकेत दिए हैं।
यह सवाल सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं है। यह सवाल उस पत्रकार तक भी पहुंचता है, जो समाज के भ्रष्टाचार, अनियमितता और अन्याय को सामने लाने के लिए अपनी कलम उठाता है।
अगर न्यायपालिका को प्रभावित करने के लिए गुमनाम शिकायतों का सहारा लिया जा सकता है, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ खबर लिखने वाले पत्रकार के खिलाफ फर्जी आरोप लगाना या मुकदमा दर्ज कराने की कोशिश कितनी आसान होगी—यह सोचने वाली बात है।
पत्रकार की कलम से आखिर इतना डर क्यों?
एक पत्रकार जब किसी सरकारी कार्यालय में अनियमितता का सवाल उठाता है, किसी अस्पताल की व्यवस्था पर रिपोर्ट करता है, किसी अधिकारी से जवाब मांगता है या किसी जमीन पर कथित कब्जे की खबर सामने लाता है, तो उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को बदनाम करना नहीं होना चाहिए—बल्कि सवाल पूछना और जनता के सामने तथ्य रखना होना चाहिए।
लेकिन कई बार खबर का जवाब खबर से नहीं दिया जाता।
दस्तावेज सामने रखने के बजाय पत्रकार के चरित्र पर सवाल उठते हैं।
तथ्यों का जवाब देने के बजाय आरोप लगाए जाते हैं।
और कभी-कभी पत्रकार को ही आरोपी बनाने की कोशिश शुरू हो जाती है।
भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने वाला पत्रकार अचानक ‘दोषी’ बना दिया जाता है, जबकि जिस भ्रष्टाचार पर उसने सवाल उठाया था, वह पीछे छूट जाता है।
यहीं से लोकतंत्र के लिए असली चिंता शुरू होती है।
FIR सच का फैसला नहीं होती
किसी पत्रकार के खिलाफ FIR दर्ज हो जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पत्रकार दोषी है। उसी तरह किसी पत्रकार द्वारा लगाया गया आरोप भी अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करता।
सच्चाई का फैसला निष्पक्ष जांच, दस्तावेजी साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया से होना चाहिए।
इसलिए यदि किसी पत्रकार के खिलाफ शिकायत है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। शिकायत झूठी है तो शिकायतकर्ता की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। और पत्रकार की खबर गलत है तो कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन सिर्फ इसलिए कि पत्रकार ने किसी ताकतवर व्यक्ति या व्यवस्था से सवाल पूछ लिया, उसे डराने, दबाने या मुकदमों में उलझाने की कोशिश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
कलम को मुकदमों में मत डुबोइए
एक पत्रकार के पास आमतौर पर न कोई सरकारी ताकत होती है, न पुलिस, न प्रशासनिक अधिकार।
उसके पास होती है तो सिर्फ उसकी कलम, कैमरा और सवाल।
वह अगर गलत लिखता है तो कानून मौजूद है।
वह अगर तथ्य छिपाता है तो जवाबदेही का रास्ता मौजूद है।
लेकिन अगर वह दस्तावेजों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर भ्रष्टाचार का सवाल उठाता है, तो उसके सवाल का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए, मुकदमों से नहीं।
क्योंकि जब हर सवाल पूछने वाले को डराया जाएगा, तो धीरे-धीरे सवाल पूछना बंद हो जाएगा।
और जिस दिन पत्रकार सवाल पूछना बंद कर देगा, उस दिन भ्रष्टाचार करने वालों के सामने सबसे बड़ा खतरा खत्म हो जाएगा।
पत्रकार की सुरक्षा का अर्थ कानून से ऊपर होना नहीं
पत्रकार भी कानून से ऊपर नहीं है।
पत्रकारिता की आड़ में झूठ, ब्लैकमेलिंग या किसी निर्दोष व्यक्ति को बदनाम करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन उसी तरह पत्रकारिता को बदनाम करने के लिए झूठे आरोप लगाना भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
जरूरत इस बात की है कि पत्रकार के खिलाफ शिकायत हो तो उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो—न शिकायतकर्ता की ताकत देखी जाए, न पत्रकार की कमजोरी।
सवाल सिर्फ एक पत्रकार का नहीं
आज सवाल किसी एक पत्रकार का नहीं है।
सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाला व्यक्ति खुद आरोपों के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है।
जिस समाज में जजों तक को गुमनाम शिकायतों के जरिए निशाना बनाने की कोशिश हो सकती है, वहां पत्रकारों के खिलाफ लगाए जाने वाले हर आरोप को भी आंख मूंदकर सच मान लेना उचित नहीं हो सकता।
शिकायत हो—जांच हो।
आरोप हो—साक्ष्य हों।
FIR हो—निष्पक्ष विवेचना हो।
और फैसला हो—तो अदालत करे।
लेकिन पत्रकार की कलम को सिर्फ इसलिए मत तोड़िए कि उसने किसी ताकतवर दरवाजे पर दस्तक दी है।
क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में पत्रकार अकेला नहीं होता—उसके पीछे उस आम आदमी की उम्मीद होती है, जिसकी आवाज अक्सर सत्ता के गलियारों तक पहुंच ही नहीं पाती।
और शायद यही वजह है कि—
“भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले पत्रकार को इल्जामों में डुबो देना आसान हो सकता है, लेकिन उसकी कलम से उठे सवालों को हमेशा के लिए दबा देना आसान नहीं।”
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